सोमवार, 18 अप्रैल 2011

युवा और राजनीति

विजय कुमार

राजनीति में युवाओं की भूमिका कैसी हो, इस पर लोगों की अलग-अलग राय हो सकती है। पिछले दिनों राहुल गांधी ने विभिन्न माध्यमों से युवा पीढ़ी से सम्पर्क किया। विश्वविद्यालयों में जाकर उन्होंने युवाओं से राजनीति को अपनी आजीविका (कैरियर) बनाने को कहा; पर उनका यह विचार कितना समीचीन है, इस पर विचार आवश्यक है।

यह तो सच ही है कि भारत एक युवा देश है। पिछले लोकसभा चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी बनाम राहुल गांधी की लड़ाई में युवा होने के कारण राहुल भारी पड़े। यद्यपि पर्दे के आगे मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं; पर सरकार में सबसे अधिक सोनिया और राहुल की ही चलती है। राहुल की इस सफलता से सब दलों को अपनी सोच बदलनी पड़ी। सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा ने तो अपना अध्यक्ष ही 52 वर्षीय नितिन गडकरी को चुन लिया। अब सब ओर युवाओं को आगे बढ़ाने की बात चल रही है। भावी राजनीति के एजेंडे पर निःसंदेह अब युवा आ गये हैं।

लेकिन युवाओं का राजनीति से जुड़ना और उसे आजीविका बनाना दोनों अलग-अलग बातें हैं; पर राहुल गांधी दोनों को एक साथ मिलाकर भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं।

सबसे पहली बात तो यह है कि राजनीति नौकरी, व्यवसाय या खेती की तरह आजीविका नहीं है। नौकरी शैक्षिक या अनुभवजन्य योग्यता से मिलती है, जबकि खेती और व्यापार प्रायः पुश्तैनी होते हैं। यद्यपि कांग्रेस और उसकी देखादेखी अधिकांश दलों ने राजनीति को भी पुश्तैनी बना लिया है; पर यह सैद्धान्तिक रूप से गलत है। प्रत्याशी भी चुनाव में हाथ जोड़कर वोट मांगते समय यही कहते हैं कि इस बार हमें सेवा का अवसर दें। जनता किसे यह अवसर देती है, यह बात दूसरी है; पर इससे स्पष्ट होता है कि राजनीति आजीविका न होकर समाज सेवा का क्षेत्र है।

भारतीय लोकतंत्र एवं संविधान लगभग ब्रिटिश व्यवस्था की नकल है। उसी के अनुरूप यहां जन प्रतिनिधियों को वेतन तथा अन्य भत्ते दिये जाते हैं। जन प्रतिनिधि लगातार अपने क्षेत्र में घूमते हैं। सैकड़ों लोग उनसे मिलने हर दिन आते हैं, जिनके चाय-पानी में बड़ी राशि व्यय होती है। यह राशि सरकार दे, इसमें आपत्ति नहीं है; पर राजनीति किसी के घर चलाने का एकमात्र साधन बन जाए, यह नितांत अनुचित है।

राजनीति में उतार-चढ़ाव आते ही हैं। लोग चुनाव हारते और जीतते रहते हैं। यदि राजनीति ही आजीविका का एकमात्र साधन होगी, तो चुनाव हारने पर व्यक्ति अपना घर कैसे चलाएगा ? यह बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे किसी की नौकरी छूट जाए, या उसे व्यापार में घाटा हो जाए या खेती धोखा दे जाए। ऐसे में व्यक्ति अपने मित्रों, परिजनों या बैंक के कर्ज आदि से फिर काम को जमा लेता है; पर राजनीति में तो ऐसा सहयोग नहीं मिलता। फिर उसके परिवार का क्या होगा ? या तो वह चोरी-डकैती करेगा या आत्महत्या। और यह दोनों ही अतिवादी मार्ग अनुचित हैं।

एक दूसरे दृष्टिकोण से इसे देखें। यदि सब जन प्रतिनिधि युवा ही बन जाएं, तो भी कुल मिलाकर कितने युवा आजीविका पा सकेंगे। लोकसभा, राज्यसभा, देश भर की विधानसभा और विधान परिषद को मिला कर संभवतः 10 हजार स्थान बनते होंगे। यदि इसमें जिला और नगर पंचायतों के प्रतिनिधि मिला लें, तो संख्या 25 हजार होगी। यदि इसमें देश की पांच लाख ग्राम पंचायतें और जोड़ लें, तो यह संख्या सवा पांच लाख हो जाएगी। यदि हर युवा राजनीति को ही आजीविका बनाने की सोच ले, तो शेष 40-45 करोड़ युवा क्या करेंगे

कौन नहीं जानता कि राजनीति और चुनाव का चस्का एक बार लगने पर आसानी से छूटता नहीं है। व्यक्ति चाहे हारे या जीते; पर वह इस क्षेत्र में ही बना रहना चाहता है। आजकल राजनीति पूर्णकालिक काम हो गयी है। इसमें अत्यधिक पैसा खर्च होता है, जिसकी प्राप्ति के लिए व्यक्ति भ्रष्ट साधन अपनाता है। इसीलिए स्थानीय नेता प्रायः ठेकेदारी करते मिलते हैं। इस दो नंबरी धंधे से वे एक झटके में लाखों-करोड़ों रु. पीट लेते हैं। कई नेता एन.जी.ओ. बनाकर सेवा के नाम पर घर भरते हैं। क्या राहुल गांधी ऐसे ही भ्रष्ट युवाओं की फौज देश में तैयार करना चाहते हैं ?

यदि किसी को भ्रम हो कि युवा लोग भ्रष्ट नहीं होते, तो राजीव गांधी को देख लें। प्रधानमंत्री बनते ही देश ने उन्हें ‘मिस्टर क्लीन’ की उपाधि दी थी। उन्होंने कांग्रेस को सत्ता के दलालों से दूर करने का आह्नान किया था। सबको लगा था कि राजनीतिक उठापटक से दूर रहा यह व्यक्ति सचमुच कुछ अच्छा करेगा। इसीलिए सहानुभूति लहर के बीच जनता ने उन्हें संसद में तीन चौथाई बहुमत दिया; पर कुछ ही समय में पता लग गया कि वह भी उसी भ्रष्ट कांग्रेसी परम्परा के वाहक हैं, जिस पर उनके नाना, मां और आम कांग्रेसी चलते रहे हैं। मिस्टर क्लीन बोफोर्स दलाली खाकर अंततः ‘मिस्टर डर्टी’ सिद्ध हुए।

अपनी अनुभवहीनता और देश की मिट्टी से कटे होने के कारण राजीव गांधी के अधिकांश निर्णय नासूर सिद्ध हुए। उन्होंने ही अंग्रेजीकरण को अत्यधिक बढ़ावा दिया, जिससे ग्राम्य प्रतिभाओं के उभरने का मार्ग सदा को बंद हो गया। पहले गरीब व्यक्ति अपने बच्चों को पाठशाला में भेजकर संतुष्ट रहता था; पर आज अंग्रेजी बोलने वाले ही नौकरी पा सकते हैं। इसलिए अपना पेट काटकर भी लोग बच्चों को महंगे अंग्रेजी विद्यालय में भेजने को मजबूर हैं। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत में स्थानीय भाषा और बोलियों का मरना जारी है। यह सब राजीव गांधी की ही देन हैं।

विदेश नीति के मामले में भी राजीव गांधी अनाड़ी सिद्ध हुए। उन्होंने तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेसी प्रभाव बढ़ाने के लिए श्रीलंका में लिट्टे को बढ़ावा दिया; पर जब लिट्टे सिर पर सवार हो गया, तो उन्होंने वहां शांति सैनिकों को भेज दिया। इससे भारत के सैकड़ों सैनिक मारे गये और विश्व भर में हमारी थू-थू हुई। श्रीलंका जैसे मित्र देश की एक बड़ी जनसंख्या के मन में भारत के प्रति स्थायी शत्रुता का भाव पैदा हो गया। राजीव की हत्या भी इसीलिए हुई। स्पष्ट है कि राजनीति में यौवन की अपेक्षा देश-विदेश के मामलों का अनुभव अधिक महत्वपूर्ण है।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि युवा पीढ़ी राजनीति से अलिप्त हो जाए; उसे देश के वर्तमान और भविष्य से कुछ मतलब ही न हो ? यदि ऐसा हुआ, तो यह बहुत ही खतरनाक होगा। इसलिए उन्हें भी राजनीति में सक्रिय होना चाहिए; पर उनकी सक्रियता का अर्थ सतत जागरूकता है। ऐसा हर विषय, जो उनके आज और कल को प्रभावित करता है, उस पर वे अहिंसक आंदोलन कर देश, प्रदेश और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को अपनी नीति और नीयत बदलने पर मजबूर कर दें। ऐसा होने पर हर दल और नेता दस बार सोचकर ही कोई निर्णय लेगा।

स्वाधीनता के आंदोलन में हजारों युवा पढ़ाई छोड़कर कूदे थे। क्या भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू, आजाद आदि राजनीतिक रूप से निष्क्रिय थे, चूंकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा ? 1948 में गांधी हत्या के झूठे आरोप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रतिबंध के विरुद्ध लगभग 70 हजार स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया। उनमें से अधिकांश युवा थे। सत्तर के दशक में असम में घुसपैठ विरोधी आंदोलन हुआ। 1974-75 में इंदिरा गांधी के भ्रष्ट प्रशासन, आपातकाल और फिर संघ पर प्रतिबंध के विरुद्ध भी एक लाख लोग जेल गये। श्रीराम मंदिर आंदोलन में लाखों हिन्दुओं ने कारावास स्वीकार किया। यद्यपि इनमें से दस-बीस लोग सांसद और विधायक भी बने; पर क्या शेष लोग राजनीतिक रूप से निष्क्रिय माने जाएंगे, चूंकि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा ?

स्पष्ट है कि राजनीतिक सक्रियता का अर्थ चुनाव लड़ना नहीं, सामयिक विषयों पर जागरूक व आंदोलनरत रहना है। बहुत से लोगों के मतानुसार वोट देने की अवस्था भले ही 18 वर्ष कर दी गयी हो; पर चुनाव लड़ने की अवस्था 50 वर्ष होनी चाहिए। जिसे नौकरी, खेती, कारोबार और अपना घर चलाने का ही अनुभव न हो; जिसने जीवन के उतार-चढ़ाव न देखें हों, वह अपने गांव, नगर, जिले, राज्य या देश को कैसे चला सकेगा ?

भारतीय जीवन प्रणाली भी इसका समर्थन करती है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के बाद 25 वर्ष का वानप्रस्थ आश्रम समाज सेवा को ही समर्पित है। इस समय तक व्यक्ति अपने अधिकांश घरेलू उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाता है। उसे दुनिया के हर तरह के अनुभव भी हो जाते हैं। काम-धंधे में नयी पीढ़ी आगे आ जाती है। यही वह समय है, जब व्यक्ति को समाज सेवा के लिए अपनी रुचि का क्षेत्र चुन लेना चाहिए, जिसमें से राजनीति भी एक है। हां, यह ध्यान रहे कि उसे 75 वर्ष का होने पर यहां भी नये लोगों के लिए स्थान खाली कर देना चाहिए।

यदि युवा पीढ़ी तीन सी (सिनेमा, क्रिकेट एवं कैरियर) से ऊपर उठकर देखे, तो सैकड़ों मुद्दे उनके हृदय में कांटे की तरह चुभ सकते हैं। महंगाई, भ्रष्टाचार, कामचोरी, राजनीति में वंशवाद, महंगी शिक्षा और चिकित्सा, खाली होते गांव, घटता भूजल, आतंकवाद, माओवादी और नक्सली हिंसा, बंगलादेशियों की घुसपैठ, हाथ से निकलता कश्मीर, जनसंख्या के बदलते समीकरण, किसानों द्वारा आत्महत्या, गरीब और अमीर के बीच बढ़ती खाई आदि तो राष्ट्रीय मुद्दे हैं। इनसे कहीं अधिक स्थानीय मुद्दे होंगे, जिन्हें आंख और कान खुले रखने पर पहचान सकते हैं।

आवश्यकता यह है युवा चुनावी राजनीति की बजाय इस ओर सक्रिय हों। उनकी ऊर्जा, योग्यता, संवेदनशीलता और देशप्रेम की आहुति पाकर देश का राजनीतिक परिदृश्य निश्चित ही बदलेगा।

(लेखक : ‘राष्ट्रधर्म’ मासिक के पूर्व सहायक सम्पादक हैं)Post templates

उदार नीतियां, बदहाल शिक्षा परिसर

संजय द्विवेदी

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय एक ऐसी लीलाभूमि है, जो नित नए प्रयोगों के लिए जानी जाती है। वहां बैठने वाला हर मंत्री अपने एजेंडे पर इस तरह आमादा हो जाता है कि देश और जनता के व्यापक हित किनारे रह जाते हैं। अब कपिल सिब्बल के पास इस मंत्रालय की कमान है। उन्हें निजीकरण का कुछ ज्यादा ही शौक है।

वह अब लगे हैं कि किस तरह नए प्रयोगों से शिक्षा क्षेत्र में क्रांतिकारी परिर्वतन कर दिए जाएं, किंतु इस तेज बदलाव के प्रयास के पीछे उनकी या मंत्रालय की सुचिंतित व स्पष्ट अवधारणा शायद ही है। बाजार को अच्छे लगने वाले परिवर्तन करके हम अपने उच्च शिक्षा के क्षेत्र का कबाड़ा ही करेंगे, लेकिन लगता है मानव संसाधन विकास मंत्रालय इन दिनों काफी उदार हो गया है। खासकर निजी क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए उसके प्रयासों को इस नजर से देखा जा सकता है।

चिंता यही है कि उसके हर कदम से कहीं बाजार की शक्तियां मजबूत न हों और उच्च शिक्षा का वैसा ही बाजारीकरण न हो जाए जैसा हमने प्राथमिक शिक्षा का कर डाला है। किंतु लगता है कि सरकार ने वही राह पकड़ ली है। ताजा सूचना यह है कि प्रतिष्ठित संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने के कदमों के तहत प्रेसिडेंसी, सेंट जेवियर और सेंट स्टीफेंस जैसे कॉलेजों को यह छूट दी जाएगी कि वे अपनी डिग्री खुद दे सकें। मानव संसाधन विकास मंत्रालय को लगता है कि इस कदम से विश्वविद्यालयों के भार में कमी आएगी। अब इसे कानून के जरिये लागू करने की तैयारी हो रही है।

कॉलेज अभी तक डिग्रियों के लिए विश्वविद्यालयों पर निर्भर रहते हैं। एनआर माधव मेनन समिति की सिफारिशों में विशेष शिक्षण स्वायत्तता पर जोर दिया गया है। जाहिर तौर पर यह कदम एक क्रांतिकारी कदम तो है, लेकिन इसके हानि और लाभों का भी आकलन किया जाना जरूरी है। कुछ बेहतर कॉलेजों को लाभ देने के लिए शुरू की जाने वाली यह योजना खराब कॉलेजों या सामान्य संस्थानों तक नहीं पहुंचेगी इसकी गारंटी क्या है? इसके खतरे बहुत बड़े हैं।

कॉलेजों की क्षमता का आकलन कौन करेगा यह भी एक बड़ा सवाल है। किस आधार पर सेंट स्टीफेंस बेहतर है और दूसरा बदतर। आखिर इस आकलन का पैमाना क्या होगा? ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने मौजूद हैं। इसी तरह एक दूसरी बड़ी बात यह है कि इससे शासकीय विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा कम होगी और वे धीरे-धीरे एक स्लम में बदल जाएंगे। सरकारी क्षेत्र के विश्वविद्यालय बदहाली के शिकार हैं, किंतु हमारे मानव संसाधन मंत्री को विदेशी और निजी विश्वविद्यालयों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में भारत में खुलवाने की जल्दबाजी है।

आखिर यह तेजी क्यों दिखाई जा रही है और कपिल सिब्बल इतनी हड़बड़ी में क्यों हैं? क्यों हम अपने पारंपरिक विश्वविद्यालयों की अकादमिक दशा व दिशा को सुधारने के लिए अपेक्षित प्रयास नहीं करते दिख रहे। आखिर इन्हीं संस्थाओं ने हमें योग्य प्रतिभाएं दी हैं, जो न केवल अपने देश में, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी अपना नाम रोशन कर रहे हैं। वारेन बफेट के मुताबिक अजीत जैन जैसे लोग सरकारी आइटीआइ से ही पढ़कर निकले हैं तो क्या इन संस्थाओं की प्रासंगिकता अब खत्म हो चुकी है, जो हम इन्हें स्लम बनाने पर आमादा हैं।

शिक्षा का काम सरकार और समाज करे तो समझ में आता है किंतु पैसे के लालची व्यापारी और कंपनियां अगर सिर्फ पैसे कमाने के मकसद से आ रही हैं तो क्या हमें सतर्क नहीं हो जाना चाहिए। आए दिन खुल रहे नए-नए निजी विश्वविद्यालय अपनी चमक-दमक से सरकारी क्षेत्र के विश्वविद्यालयों को निरंतर चुनौती दे रहे हैं। यह एक ऐसा समय है जिसमें निजी क्षेत्र को अपनी ताकत दिखाने का निरंतर अवसर है। कॉलेजों की स्वायत्तता एक ऐसा कदम होगा जिससे हमारे विश्वविद्यालय कमजोर ही होंगें और कॉलेजों पर नियंत्रण रखने का उपाय हमारे पास आज भी नहीं है।

कम से कम विश्वविद्यालय से संबद्धता के नाम पर कुछ नियंत्रण बना और बचा रहता है, लेकिन अब वह भी खत्म होने के कगार पर है। इसे बचाने की जरूरत है। इसके लिए आवश्यक है कि ऐसी कोई समानांतर व्यवस्था बनाई जाए जो इन कॉलेजों का नियमन कर सके। किंतु वह व्यवस्था भी भ्रष्टाचार से मुक्त होगी इसमें फिलहाल संदेह ही है। आप कुछ भी कहें हमारी ज्यादातर नियामक संस्थाएं आज भ्रष्टाचार का एक केंद्र बन गई हैं। निजीकरण की तेज हवा ने इस भ्रष्टाचार को एक आंधी में तब्दील कर दिया है।

विभिन्न कोर्सेज की मान्यता प्रदान करने के लिए ये नियामक संस्थाएं कैसे और कितने तरह का भ्रष्टाचार करती हैं इसे निजी क्षेत्र के शिक्षा कारोबारियों से जाना जा सकता है। हालांकि इसका अंतत: फल भुगतता बेचारे अभिभावक और छात्र ही हैं, क्योंकि यह सारा धन तो अंततोगत्वा तो उसकी जेब से ही वसूला जाता है।

अपनी जिम्मेदारियों से पीछा छुड़ाने वाली हमारी लोक कल्याणकारी सरकारें भले ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के प्रवेश और विदेश निवेश के लिए लाल कालीन बिछाने पर आमादा हों, लेकिन इससे उच्च शिक्षा एक खास तबके तक शायद सीमित होकर रह जाएगी। यह गंभीर चिंता का विषय है कि केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक निरंतर निजी विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहन देने वाली नीतियों को बनाने में लगी हैं और अपने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की चिंता उन्हें शायद ही है। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, लेकिन इसकी चिंता राज्यों की सरकारों को नहीं है। जनता की जिम्मेदारी से जुड़े हर काम से अपना हाथ खींचकर सरकारें सारा कुछ बाजार को सौंपने पर आमादा हैं, जिसके कारण को समझना फिलहाल एकमुश्किल काम है। आज शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र पूरी तरह बाजार के हवाले हो चुके हैं।

क्या इस तरह के कामों से एक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का मजाक नहीं बनाया जा रहा है। यह समझ में नहीं आने वाली बात है कि एक व्यापारी अपने ब्रांड का विस्तार करता है और उसका संरक्षण भी करता है किंतु हमारी सरकारें अपने स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और अस्पतालों को उजाड़ने में लगी हैं। ऐसे में आम आदमी के सामने विकल्प क्या बचता है।

महंगी शिक्षा और महंगा इलाज क्या एक लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा से मेल खाते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में निजी क्षेत्र को मजबूत करते हुए हम क्या संदेश देना चाहते हैं। क्या वास्तव में हमने अपने जनतंत्र को एक मजाक बनाने की ठान ली है और हमारे पास दूसरे कोई विकल्प नहीं हैं। कुल मिलाकर सारी कवायद कुछ निजी कॉलेजों को ताकत देने का तक ही सीमित लगती है। इसमें व्यापक हितों की अनदेखी की जा रही है।

सरकार जिस तरह निजी क्षेत्र पर मेहरबान है उसमें कुछ भी संभव है, लेकिन इतना तय है कि आम आदमी के लिए उच्च शिक्षा का क्षेत्र आने वाले दिनों में एक सपना हो जाएगा। इससे समाज में तनाव और विवाद की स्थितियां ही बनेंगी। केंद्र सरकार कॉलेजों को स्वायत्तता देने के सवाल पर थोड़ी संजीदगी दिखाए, क्योंकि इसके कई खतरे हैं। पूरे मसले पर व्यापक विमर्श के बाद ही कोई कदम उठाना उचित होगा, क्योंकि यह सवाल आम लोगों के भविष्य से भी जुड़ा है।

(लेखक माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े हैं)Post templates

भारतीय राजनीति पर विकीलीक्स का एहसान

अवनीश सिंह

इसे कहते हैं बहुमत में जल्दी बड़ा "जुर्माना"। भारतीय राजनीति पर एहसान कहिए विकीलीक्स का जिसने जुर्माना को हर्जाना बना दिया। जिसे चुकाने में अब पीएम साहब खुद चुक रहे हैं। टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ.....पीएम कह रहे है पता नहीं। कॉमनवेल्थ घोटाला हुआ....पीएम कह रहे है पता नहीं। थॉमस की अवैध नियुक्ति पर पीएम कह रहे है पता नहीं। 14 वीं लोकसभा में विश्वास मत हासिल करने के दौरान सांसदों का खरीद फरोख्त हुआ....पीएम कह रहे है पता नहीं। जब कुछ पता नहीं है साहब तो पीएम बने रहने की मजबूरी क्या है।

22 जुलाई 2008 को हुई सियासी हादसे का चश्मदीद आप से बड़ा कौन होगा। सरकार को कंधा देने की नौबत आ गयी थी। लेकिन....इंतजाम इतना पक्का था कि.....आप के श्रीमुख से निकली शायरी पर आपके सहयोगी दलों के नासमझों ने भी खूब ताली पीटी थी। अब तो विकिलीक्स के खुलासे से सियासी गलियारों में खलबली मच गयी। अजित कह रहे हैं हमारे सांसदों ने वोट नहीं दिया। मुलायम सिंह तो वोट देकर फंस गए। और लेफ्ट तो अमेरिका की मां की आंख में ही यकीन रखता है।

अब तो प्रधानमंत्री के बारे में यह अवधारणा बन चुकी है कि इस सरकार को कोई अदृश्य शक्ति चला रही है। वह संवैधानिक दृष्टि से संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन वस्तुतः वह सोनिया गांधी के प्रति उत्तरदायी हैं। वह मंत्रिपरिषद के प्रधान हैं, लेकिन मंत्रिगण उनकी बात नहीं सुनते। वह स्वयं ईमानदार हैं, लेकिन सरकारी भ्रष्टाचार पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। वह अंतरराष्टीय ख्याति के अर्थशास्त्री हैं, लेकिन महंगाई जैसी आर्थिक समस्या के सामने ही उन्होंने हथियार डाले हैं।

पीएम साहब ...शर्म करो उस शक्तिबोध को जो इस फरेब को राजनीतिक आस्था में तब्दील करने के लिए जालिम बना रही है। इस अंधेरगर्दी पर विकीलीक्स का चाबुक ऐसा हिसाब लेगा किसी ने नहीं सोचा था। 23 मार्च 2011 को लोकसभा में सुषमा स्वराज मनमोहन सिंह पर बरस पड़ी। कहा जब कुछ पता नहीं है तो पीएम क्यों बने हैं। सुषमा के पांच सवालों के चक्रव्यूह में यूपीए सरकार छटपटा रही थी। लेकिन जब-जब सरकार ने मुंह खोला तो यही निकला...यकीन करिए विश्वास मत के दौरान "मन" ठीक था।

देश की जनता को अपने प्रधानमंत्री की इस ईमानदारी और वास्तविक स्वीकारोक्ति की तारीफ करनी चाहिए। प्रधानमंत्री की बातों से यह तो स्पष्ट हो गया है हमारे देश के विद्वान प्रधानमंत्री कई अंतर्विरोधों के शिकार हैं। वह सरल ह्दय गैरराजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन देश के राजप्रमुख हैं।

घोटाले दर घोटाले

महंगाई घोटाला:- इस सरकार का सबसे बड़ा घोटाला महंगाई है जिससे देश का हर आम नागरिक परेशान है! सरकार की नीतियों की वजह से बाजार में जरूरी चीजो के दाम आसमान छू रहे है और बिचौलिये मालामाल हो रहे है! महंगाई कई गुना बढ चुकी है !कुछ सस्ता हुआ है तो बस लोगो की जान!

एस बैंड घोटाला :-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के नियंत्रण में काम करने वाली अंतरिक्ष संस्था इसरो ने एक निजी कम्पनी देवास के हाथ कौड़ियो के मोल लाइसेंस बेच कर देश को 2 लाख करोड़ का चुना लगा दिया! इतनी रकम से छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य का हर व्यक्ति लखपति बन सकता था! इस घोटाले से न सिर्फ देश का आर्थिक नुकसान हुआ है बल्कि उसकी सुरक्षा भी खतरे में पड़ गयी है !लाइसेंस लेने वाली कम्पनी में खुद इसरो के अधिकारी हिस्सेदार है! यह घोटाला सीधे प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल खड़ा करता है!

2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला :- मोबाईल कंपनियों को नाम मात्र की कीमत पर लाइसेंस देकर एक लाख सत्तर हजार करोड़ का वारा न्यारा कर दिया गया !इतने पैसो से देश भर में सड़क,अस्पताल और स्कूल बनाये जा सकते थे! CBI ने तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा को ही अपनी गिरफ्त में लिया है! लेकिन इतना बड़ा घोटाला क्या उन्होंने उच्च पदों पर बैठे लोगो की सहमती के बगैर कर डाला! नीरा राडिया के टेप से यह बात जाहिर हो गया है कि राजा को मंत्री बनाने में दलालों एवं गैर सवैधानिक हस्तियों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी! नियंत्रक महालेखा परीक्षक ने यह रिपोर्ट दी है कि इस घोटाले के कारण देश का 1.77 लाख करोड़ रुपया लूट लिया गया!

कामनवेल्थ घोटाला:- पिछले साल दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलो का घोटाला फूटा! इसने सारी दुनिया के आगे देश का सिर शर्म से झुका दिया !पुरे आयोजन में 58 हजार करोड़ कि गड़बड़ी उजागर हुई है! आयोजन समिति के मुखिया सुरेश कलमाड़ी को इसका जिम्मेदार मन गया,पर अभी तक वे सिर्फ अपना पद गंवा कर सुरक्षित बचे हुए है!

आदर्श घोटाला:- मुंबई के पाश इलाके में सेना कि जमीन पर कारगिल के शहीदों के लिए 6 मंजिला ईमारत में फ़्लैट बनाने कि बात हुई! लेकिन नेताओ और अफसरों कि मिलीभगत से ये ईमारत 31 मंजिला बन गयी और शहीदों के लिए आरक्षित घर की जगह नेताओ के घरवालो ने ली की, नेताओं ने बंदरबाट कर ली! फ्लेटो कि बाजार में कीमत 8.5 करोड़ है! फ्लेट पाने वालो में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के साले, साली और सास भी शामिल है! घोटाले के खुलासे के बाद मुख्यमंत्री को कुर्सी छोडनी पड़ी और उन पर मुकदमा भी चलाया जा रहा है!

खाधान्न घोटाला :-उत्तर प्रदेश में करीब 35 हजार करोड़ रूपये का अनाज अफसरों ने मिलीभगत कर देश के दुसरे शहरो और विदेशो में बेच दिया! यह अनाज विभिन्न योजनाओ के तहत गरीबो को दिया जाने वाला था! इलाहबाद हाईकोर्ट ने इस घोटाले कि पूरी जांच CBI को सौंप दी है! सात साल तक चली इस हेरा फेरी को लेकर यूपी में करीब पांच हजार FIR दर्ज है!

सडा-गला खाधान्न घोटाला:- इस घोटाले में 58 हजार करोड़ का नुकसान देश को हुआ है! भाजपा का आरोप है कि जानबूझ कर अनाज को सडाया गया ताकि शराब लाबियो को सस्ते दामो पर उसे बेचा जा सके! FCI के गोदामों में रखा 67 हजार 542 टन अनाज सड़ गया! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिए थे कि इस अनाज को देश के 40 हजार करोड़ गरीब लोगो के बिच बाट देना चाहिए! लेकिन केंद्र सरकार कि मंशा शराब लाबियो को लाभ पहुचने कि थी इसलिए उसने इसे मानने से इंकार कर दिया!

हाऊसिंग लोन घोटाला:-CBI ने नवम्बर 2010 में हाऊसिंग घोटाले का भी पर्दाफास किया! उसके मुताबिक यह पूरा घोटाला 1000 करोड़ रूपये का है! इस सिलसिले में LIC हाऊसिंग फायनेंस के CEO रामचंद्रन नायर के आलावा विभिन्न बैंको और वित्तीय संस्थाओ के कई बड़े अधिकारी गिरफ्तार किये गये !

पामोलिन घोटाला :- घोटालो के आरोप से घिरे केरल केडर के IS अधिकारी पी जी थामस को आपत्ति के बावजूद मुख्य सतर्कता आयुक्त बनाया गया! केरल में वर्ष 91-92 में सिंगापूर से पामोलिन तेल आयात किया गया था !थामस पर यह आरोप है कि उसने तेल कि अधिक कीमत चुकाकर 2.32 करोड़ रूपये का नुकसान देश को पहुचाया था! 2003 में विजिलेंस ने इस मामले में चार्जशीट दाखिल कि और आरोपियों कि सूची में थामस का नाम शामिल किया! थामस को हटाने कि मांग लम्बे समय से कि जा रही थी लेकिन सरकार अपने फायदे के लिए उसे बचाती रही अंतत: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस घोटालेबाज अफसर को पड़ छोड़ना पड़ा!

IPL घोटाला:- IPL की कोच्ची टीम कि नीलामी में गलत ढंग से UPA के मंत्री शशि थरूर कि पत्नी कि कम्पनी को 10 प्रतिशत कि हिस्सेदारी देकर करीब 70 करोड़ रूपये का घोटाला किया गया! इस मामले में जंहा शशि थरूर को मंत्री पद गवाना पड़ा वही इस घपले कि सुई केन्द्रीय मंत्री शरद पवार एवम प्रफुल्ल पटेल कि और भी घूमी! आरोप है कि इनके परिवार के सदस्यों का भी इसमें शेयर था!

काला धन:- घरलू मोर्चे पर जंहा देश कि जनता बदहाल है वही कुछ वर्ग विशेष के लोगो कि काली कमाई में अपार वृद्धि हुई है! दुनिया के 22 देशो में भारतीयों कि 15 हजार करोड़ रूपये कि काली कमाई जमा होने कि जानकारी लग चुकी है !एक आकलन के अनुसार विदेशो में जमा धन भारत के सकल घरलू उत्पाद से भी ज्यादा है !उन पैसो से देश के सभी हिस्सों कि सड़क, बिजली, पानी, अस्पताल, मकान आदि कि जरूरत पूरी कि जा सकती है! यदि घोटाले कि पूरी रकम का उचित उपयोग किया जाता तो शायद देश के हर नागरिक का विदेशी कर्ज चुकाया जा सकता था! यह संदेह पैदा होने के पर्याप्त कारण है कि केंद्र सरकार जानबूझकर काली कमाई करने वाले लोगो को बचा रही है!

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी देश में लंबे समय तक शासन का अनुभव रखने वाली कांग्रेस सरकार को अभी तक यह समझ में नहीं आया है कि भ्रष्टाचार से कैसे निपटा जाए? भ्रष्टाचार ने सरकार की छवि को बट्टा लगाया है। भ्रष्टाचार के चलते अंतरराष्टीय स्तर पर देश की छवि भी धूमिल हुई है। यह तो स्पष्ट हो चुका है कि संप्रग सरकार घोटालों की प्रतीक बन गई है। आए दिन घोटाले की खबरें आ रही हैं। आजादी के बाद इतना कमजोर प्रधानमंत्री शायद किसी ने देखा हो, जिसका अपनी सरकार के काम-काज पर ही नियंत्रण नहीं है।

भ्रष्ट मंत्रियो को लुटेरो का गिरोह कहा जाय तो गलत नहीं होगा! देश को जितना विदेशी हमलावरों ने नहीं लुटा इस सरकार में बैठे हुए लोग लुट रहे है! गोदामों में अनाज सड़ रहा है, किसान आत्महत्या कर रहे है और इस सरकार के मंत्री अफसर इतना कमा रहे है की उसे स्विस बैंको में जमा करवाना पड़ रहा है! सीमा पार जो जवान देश की रक्षा करते हुए शहीद हो रहे है उनके हिस्से के मकान तक इन लोगो ने हड़प डाले!वआम भारतीय 20 रूपये से भी कम में गुजारा कर रहा है और भ्रष्ट मंत्री घोटालो में करोड़ो से अरबो खरबों में पहुच रहे है! इस देश में भ्रष्ट लोग बेखौफ है, सुखी है! मेहनतकश उपेक्षित है, शोषित है और पीड़ित है!

आप इस संदिग्ध सच्चाई को स्वीकारिये या धिक्कारिये...लेकिन नकार नहीं सकते। ईमानदारी के ताजमहल के बजाय झूठ का पिरामिड खड़ी करने में जितनी दिलचस्पी पीएम साहब ले रहे है उससे भारतीय राजनीति तकदीर के सितारे जगमगाएंगे जरूर...लेकिन सिर्फ उजाले में।Post templates

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

विक्रम संवत् 2068 भारतीय नववर्ष का शुभारम्भ

नयी दिल्ली। सोमवार, 4 अप्रैल, सन् 2011 को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से रेवती नक्षत्र में विक्रम संवत् 2068 भारतीय नववर्ष का शुभारम्भ हो रहा है। साथ ही वासंतिक नवरात्र का पावन पर्व भी आज ही प्रारंभ हो रहा है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव श्रृंगार किया जाता है।

भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीनकाल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्यतिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत राष्ट्र की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत् को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत राष्ट्र इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है।

भारतवर्ष में इस समय देशी तथा विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत् यदि कोई है तो वह विक्रम संवत् ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष पूर्व यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से विक्रम संवत् का भी आरम्भ हुआ था।

पुराणों के अनुसार इसी तिथि से ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। पंचांगों के अनुसार इस नए संवत्सर का नाम 'क्रोधी" संवत्सर है जिसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार और महंगाई के विरुद्ध जन-आक्रोश भड़कने की सम्भावनाएं अधिक हैं। संवत्सर का राजा चंद्रमा होने के कारण जनता में आपसी सौहार्द तथा प्रेमभावना की अभिवृद्धि का योग है तो मंत्री गुरु होने के कारण धन-धान्य तथा अच्छी फसल होने के भी संकेत हैं।

अवनीश। 04 अप्रैल, 2011

शनिवार, 26 मार्च 2011

मध्य प्रदेश के कालेजों में छात्राएं असुरक्षित : अभाविप

मध्य प्रदेश के कालेजों में छात्राएं असुरक्षित : अभाविप

भोपाल। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) ने कहा है कि मध्य प्रदेश के शिक्षा परिसरों में छात्राएं असुरक्षित हैं और उनके शोषण की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। संगठन ने इन मामलों की जांच के लिए एक आयोग बनाने और विश्वविद्यालयों में महिला प्रकोष्ठ गठित करने की मांग सरकार से की है।

अभाविप के क्षेत्रीय संगठन मंत्री विष्णुदत्त शर्मा के मुताबिक इस संबंध में राज्य सरकार से 280 शिकायतें की गई, मगर कोई कार्रवाई नहीं होने से छात्राओं का शोषण करने वालों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं। शर्मा ने कहा कि छात्रावासों में रहने वाली छात्राएं सुरक्षित नहीं हैं। शर्मा ने जबलपुर के सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कालेज में किस्मत के बदले अस्मत, ग्वालियर के फिजिकल डिपार्टमेंट की छात्रा का विभागाध्यक्ष द्वारा शोषण और खंडवा के कृषि महाविद्यालय की घटना का उदाहरण देते हुए मौजूदा हालातों पर चिंता जताई। अभाविप नेता ने कहा कि भले ही प्रदेश में भाजपा की सरकार हो पर विश्वविद्यालयों और कालेज परिसरों के जो हालात हैं, उनको सामने लाने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है। उन्होंने कहा कि छात्राओं के शोषण के मामलों का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि ज्यादातर प्रकरणों में गुरुओं की भूमिका सवालों के घेरे में है। उन्होंने पिछले दिनों खंडवा के कृषि महाविद्यालय में छात्रा के कथित उत्पीड़न के मामले में एक प्राध्यापक के मुंह पर कालिख पोतने से सदमे में आए उनके साथी प्राध्यापक सुरेंद्र सिंह ठाकुर की मौत के मामले में भी सफाई दी और कहा कि वह इस घटना का समर्थन नहीं करते। शर्मा के अनुसार जबलपुर चिकित्सा महाविद्यालय में परीक्षा में अंक दिए जाने के नाम पर छात्राओं के साथ जो हुआ वह किसी से छिपा नहीं है। भोपाल के बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में एक छात्रा को गोली मार दी गई थी, जिसमें कई नेताओं के नाम भी सामने आए थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि अभाविप छात्र हितों की लड़ाई लड़ने वाला संगठन है और वह उससे डिगेगा नहीं। उन्होंने बताया कि एबीवीपी ने अपने रुख से राज्य सरकार को अवगत करा दिया है। अवनीश। 22 मार्च, 2011

बुधवार, 23 मार्च 2011

अमर शहीद सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव

शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगत सिंह

भारत के शहीद-ए-आज़म अमर शहीद सरदार भगतसिंह का नाम विश्व में 20वीं शताब्दी के अमर शहीदों में बहुत ऊँचा है। (जन्म- 27 सितंबर, 1907 ई., लायलपुर,पंजाब, मृत्यु- 23 मार्च, 1931 ई., लाहौर, पंजाब)। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। भगतसिंह अपने देश के लिये ही जीये और उसी के लिए शहीद भी हो गये।

जीवन परिचय

भगतसिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा गाँव (पाकिस्तान) में हुआ था, एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। भगतसिंह के पिता 'सरदार किशन सिंह' एवं उनके दो चाचा 'अजीतसिंह' तथा 'स्वर्णसिंह' अंग्रेज़ों के ख़िलाफ होने के कारण जेल में बन्द थे । जिस दिन भगतसिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया । इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगतसिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गयी थी । भगतसिंह की दादी ने बच्चे का नाम 'भागां वाला' (अच्छे भाग्य वाला) रखा । बाद में उन्हें 'भगतसिंह' कहा जाने लगा । वे 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रान्तिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बन्धन में बाँधने की तैयारियाँ होने लगी तो वेलाहौर से भागकर कानपुर आ गये।

कानपुर में उन्हें श्री गणेश शंकर विद्यार्थी का हार्दिक सहयोग भी प्राप्त हुआ। देश की स्वतंत्रता के लिए अखिल भारतीय स्तर पर क्रान्तिकारी दल का पुनर्गठन करने का श्रेय सरदार भगतसिंह को ही जाता है। उन्होंने कानपुर के 'प्रताप' में 'बलवंत सिंह' के नाम से तथा दिल्ली में 'अर्जुन' के सम्पादकीय विभाग में 'अर्जुन सिंह' के नाम से कुछ समय काम किया और अपने को 'नौजवान भारत सभा' से भी सम्बद्ध रखा।

क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में

1919 में रॉलेक्ट एक्ट के विरोध में संपूर्ण भारत में प्रदर्शन हो रहे थे और इसी वर्ष 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग़ काण्ड हुआ । इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुंचे। देश पर मर-मिटने वाले शहीदों के प्रति श्रध्दांजलि दी तथा रक्त से भीगी मिट्टी को उन्होंने एक बोतल में रख लिया, जिससे सदैव यह याद रहे कि उन्हें अपने देश और देशवासियों के अपमान का बदला लेना है ।

असहयोग आंदोलन का प्रभाव

1920 के महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर 1921 में भगतसिंह ने स्कूल छोड़ दिया। असहयोग आंदोलन से प्रभावित छात्रों के लिए लाला लाजपत राय ने लाहौर में 'नेशनल कॉलेज' की स्थापना की थी। इसी कॉलेज में भगतसिंह ने भी प्रवेश लिया। 'पंजाब नेशनल कॉलेज' में उनकी देशभक्ति की भावना फलने-फूलने लगी। इसी कॉलेज में ही यशपाल, भगवतीचरण, सुखदेव, तीर्थराम, झण्डासिंह आदि क्रांतिकारियों से संपर्क हुआ। कॉलेज में एक नेशनल नाटक क्लब भी था। इसी क्लब के माध्यम से भगतसिंह ने देशभक्तिपूर्ण नाटकों में अभिनय भी किया। ये नाटक थे -

राणा प्रताप, भारत-दुर्दशा और सम्राट चन्द्रगुप्त।

वे 'चन्द्रशेखर आज़ाद' जैस महान क्रान्तिकारी के सम्पर्क में आये और बाद में उनके प्रगाढ़ मित्र बन गये। 1928 में 'सांडर्स हत्याकाण्ड' के वे प्रमुख नायक थे। 8 अप्रैल, 1929 को ऐतिहासिक 'असेम्बली बमकाण्ड' के भी वे प्रमुख अभियुक्त माने गये थे। जेल में उन्होंने भूख हड़ताल भी की थी। वास्तव में इतिहास का एक अध्याय ही भगतसिंह के साहस, शौर्य, दृढ़ सकंल्प और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है।

सेफ्टी बिल तथा ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल का विरोध

विचार-विमर्श के पश्चात यह निर्णय हुआ कि इस सारे कार्य को भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु अंजाम देंगे। पंजाब के बेटों ने लाजपत राय के ख़ून का बदला ख़ून से ले लिया। सांडर्स और उसके कुछ साथी गोलियों से भून दिए गए। उन्हीं दिनों अंग्रेज़ सरकार दिल्ली की असेंबली में पब्लिक 'सेफ्टी बिल' और 'ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल' लाने की तैयारी में थी। ये बहुत ही दमनकारी क़ानून थे और सरकार इन्हें पास करने का फैसला कर चुकी थी। शासकों का इस बिल को क़ानून बनाने के पीछे उद्देश्य था कि जनता में क्रांति का जो बीज पनप रहा है उसे अंकुरित होने से पहले ही समाप्त कर दिया जाए।

असेम्बली बमकाण्ड

गंभीर विचार-विमर्श के पश्चात 8 अप्रैल 1929 का दिन असेंबली में बम फेंकने के लिए तय हुआ और इस कार्य के लिए भगत सिंह एवंबटुकेश्र्वर दत्त निश्चित हुए। यद्यपि असेंबली के बहुत से सदस्य इस दमनकारी क़ानून के विरुद्ध थे तथापि वायसराय इसे अपने विशेषाधिकार से पास करना चाहता था। इसलिए यही तय हुआ कि जब वायसराय पब्लिक सेफ्टी बिल को क़ानून बनाने के लिए प्रस्तुत करे, ठीक उसी समय धमाका किया जाए और ऐसा ही किया भी गया। जैसे ही बिल संबंधी घोषणा की गई तभी भगत सिंह ने बम फेंका। इसके पश्चात क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने का दौर चला। भगत सिंह और बटुकेश्र्वर दत्त को आजीवन कारावास मिला।

भगत सिंह और उनके साथियों पर 'लाहौर षडयंत्र' का मुकदमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में अदालत ने वही फैसला दिया, जिसकी पहले से ही उम्मीद थी। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु को मृत्युदंड की सज़ा मिली।

फाँसी की सज़ा

23 मार्च 1931 की रात भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु देशभक्ति को अपराध कहकर फांसी पर लटका दिए गए। यह भी माना जाता है कि मृत्युदंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन जन रोष से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलुज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया। 'लाहौर षड़यंत्र' के मुक़दमें में भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा मिली तथा केवल 24 वर्ष की आयु में ही, 23 मार्च 1931 की रात में उन्होंने हँसते-हँसते संसार से विदा ले ली। भगतसिंह के उदय से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली वरन् नवयुवकों के लिए भी प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। वे देश के समस्त शहीदों के सिरमौर थे। 24 मार्च को यह समाचार जब देशवासियों को मिला तो लोग वहां पहुंचे, जहां इन शहीदों की पवित्र राख और कुछ अस्थियां पड़ी थीं। देश के दीवाने उस राख को ही सिर पर लगाए उन अस्थियों को संभाले अंग्रेज़ी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने लगे। देश और विदेश के प्रमुख नेताओं और पत्रों ने अंग्रेज़ी सरकार के इस काले कारनामे की तीव्र निंदा की।

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है –

भगतसिंह एक प्रतीक बन गया । साण्डर्स के कत्ल का कार्य तो भुला दिया गया लेकिन चिह्न शेष बना रहा और कुछ ही माह में पंजाब का प्रत्येक गांव और नगर तथा बहुत कुछ उत्तरी भारत उसके नाम से गूंज उठा । उसके बारे में बहुत से गीतों की रचना हुई और इस प्रकार उसे जो लोकप्रियता प्राप्त हुई । वह आश्चर्यचकित कर देने वाली थी

वह शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की यह पंक्तियां गाते थे–

मेरा रंग दे बसंती चोला ।

इसी रंग में रंग के शिवा ने मां का बंधन खोला ॥

मेरा रंग दे बसंती चोला

यही रंग हल्दीघाटी में खुलकर था खेला ।

नव बसंत में भारत के हित वीरों का यह मेला

मेरा रंग दे बसन्ती चोला।

अंग्रेज़ों से बचने के लिए भगतसिंह ने भेष बदला। उन्होंने अपने केश और दाढ़ी कटवाकर, पैंट पहनी और हैट लगाकर अंग्रेज़ों की आंखों में धूल झोंक कर कलकत्ता पहुंचे। कुछ दिन बाद वे आगरा गए।

'हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र संघ' की केन्द्रीय कार्यकारिणी की सभा में 'पब्लिक सेफ्टी बिल' और 'डिस्प्यूट्स बिल' के विरोध में भगतसिंह ने 'केन्द्रीय असेम्बली' में बम फेंकने का प्रस्ताव रखा। भगतसिंह के सहायक बटुकेश्वर दत्त बने।

पिस्तौल और पुस्तक भगतसिंह के दो परम विश्वसनीय मित्र थे।

जेल में पुस्तकें पढक़र ही वे अपने समय का सदुपयोग करते थे, जेल की कालकोठरी में उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी-

आत्मकथा, दि डोर टू डेथ (मौत के दरवाजे पर),

आइडियल ऑफ सोशलिज्म (समाजवाद का आदर्श),

स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार।

भगतसिंह की शौहरत से प्रभावित होकर डॉ. पट्टाभिसीतारमैया ने लिखा है —

यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय था, जितना कि गांधीजी का।

लाहौर के उर्दू दैनिक समाचारपत्र 'पयाम' ने लिखा था —

हिन्दुस्तान इन तीनों शहीदों को पूरे ब्रितानिया से ऊंचा समझता है। अगर हम हज़ारों-लाखों अंग्रेज़ों को मार भी गिराएं, तो भी हम पूरा बदला नहीं चुका सकते। यह बदला तभी पूरा होगा, अगर तुम हिन्दुस्तान को आज़ाद करा लो, तभी ब्रितानिया की शान मिट्टी में मिलेगी। ओ ! भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव, अंग्रेज़ खुश हैं कि उन्होंने तुम्हारा खून कर दिया। लेकिन वो ग़लती पर हैं। उन्होंने तुम्हारा खून नहीं किया, उन्होंने अपने ही भविष्य में छुरा घोंपा है। तुम जिन्दा हो और हमेशा जिन्दा रहोगे।

"दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उलफत;

मेरी मिटटी से भी खुशबु-ए-वतन आयेगी ।

इन्कलाब जिंदाबाद

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शहीद सुखदेव

15 मई, 1907 को पंजाब के लायलपुर, जो अब पाकिस्तान का फैसलाबाद है, में जन्मे सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आज़ादी का सपना पाले हुए थे। ये दोनों 'लाहौर नेशनल कॉलेज' के छात्र थे। दोनों एक ही सन में लायलपुर में पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हो गए।

दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। चंद्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में 'पब्लिक सेफ्टी' और 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' के विरोध में 'सेंट्रल असेंबली' में बम फेंकने के लिए जब 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी' (एचएसआरए) की पहली बैठक हुई तो उसमें सुखदेव शामिल नहीं थे। बैठक में भगतसिंह ने कहा कि बम वह फेंकेंगे, लेकिन आज़ाद ने उन्हें इज़ाज़त नहीं दी और कहा कि संगठन को उनकी बहुत ज़रूरत है। दूसरी बैठक में जब सुखदेव शामिल हुए तो उन्होंने भगत सिंह को ताना दिया कि शायद तुम्हारे भीतर जिंदगी जीने की ललक जाग उठी है, इसीलिए बम फेंकने नहीं जाना चाहते। इस पर भगतसिंह ने आज़ाद से कहा कि बम वह ही फेंकेंगे और अपनी गिरफ्तारी भी देंगे।

अगले दिन जब सुखदेव बैठक में आए तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं। वह भगत को ताना मारने की वजह से सारी रात सो नहीं पाए थे। उन्हें अहसास हो गया था कि गिरफ्तारी के बाद भगतसिंह की फांसी निश्चित है। इस पर भगतसिंह ने सुखदेव को सांत्वना दी और कहा कि देश को कुर्बानी की ज़रूरत है। सुखदेव ने अपने द्वारा कही गई बातों के लिए माफी मांगी और भगतसिंह इस पर मुस्करा दिए। hबगतसिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में पास-पास ही रहा करते थे।

भारत माँ के इस सच्चे सपूत सुखदेव को हम सब की ओर से शत शत नमन !!

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शहीद राजगुरु

शहीद राजगुरु का पूरा नाम 'शिवराम हरि राजगुरु' था। राजगुरु का जन्म 24 अगस्त,1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव में हुआ था, जिसका नाम अब 'राजगुरु नगर' हो गया है। उनके पिता का नाम 'श्री हरि नारायण' और माता का नाम 'पार्वती बाई' था। भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी

आज़ादी का प्रण

राजगुरु `स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे हासिल करके रहूंगा' का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे। 1919 मेंजलियांवाला बाग़ में जनरल डायर के नेतृत्व में किये गये भीषण नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी और निर्भीक बना दिया तथा उन्होंने उसी समयभारत को विदेशियों के हाथों आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा ली और प्रण किया कि चाहे इस कार्य में उनकी जान ही क्यों न चली जाये वह पीछे नहीं हटेंगे।

सुनियोजित गिरफ़्तारी

जीवन के प्रारम्भिक दिनों से ही राजगुरु का रुझान क्रांतिकारी गतिविधियों की तरफ होने लगा था। राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को शहीद-ए-आजम भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक पद पर नियुक्त अंग्रेज़ अधिकारी 'जे. पी. सांडर्स' को गोली मार दी थी और ख़ुद को अंग्रेज़ी सिपाहियों से गिरफ़्तार कराया था। यह सब पूर्व नियोजित था।

अदालत में बयान

अदालत में इन क्रांतिकारियों ने स्वीकार किया था कि वे पंजाब में आज़ादी की लड़ाई के एक बड़े नायक लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेना चाहते थे। अंग्रेज़ों के विरुद्ध एक प्रदर्शन में पुलिस की बर्बर पिटाई से लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई थी

प्रसिद्ध तिकड़ी (भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु )

राजगुरु ने भगत सिंह के साथ मिलकर सांडर्स को गोली मारी थी

राजगुरु ने 28 सितंबर, 1929 को एक गवर्नर को मारने की कोशिश की थी जिसके अगले दिन उन्हें पुणे से गिरफ़्तार कर लिया गया था।

राजगुरु पर 'लाहौर षड़यंत्र' मामले में शामिल होने का मुक़दमा भी चलाया गया।

फ़ाँसी का दिन

राजगुरु को भी 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे लाहौर के केंद्रीय कारागार में उनके दोस्तों भगत सिंह और सुखदेव के साथ फ़ाँसी पर लटका दिया गया.

विशेष

इतिहासकार बताते हैं कि फाँसी को लेकर जनता में बढ़ते रोष को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों के शवों का अंतिम संस्कार फ़िरोज़पुर ज़िले के हुसैनीवाला में कर दिया था

वन्दे मातरम