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सोमवार, 13 जून 2011

आई ज्ञान की आंधी

आई ज्ञान की आंधी

आशुतोष

कबीरदास ने कहा है – संतों भाई, आई ज्ञान की आंधी। भ्रम की टाटी सबै उड़ाणी, माया रहे न बाकी। आंधी तो आंधी है। वह जब आती है तो सब कुछ उड़ा ले जाती है। ऊंचा-नीचा, अच्छा-बुरा, उजला-काला, रात-दिन, कुछ नहीं देखती। सामने तिनका हो या पूरा पेड़, वह उसे उड़ा ले जाने की कोशिश करती है। तिनके नाजुक भी होते हैं और हल्के भी। जिसमें अपना वजन नहीं होता वह हवाओं के सहारे ही उड़ते हैं। जमीन से जुड़ाव खत्म होने के बाद तिनकों की यही नियति होती है। यह उड़ान नहीं भटकाव है। मिट्टी में मिल जाने की प्रक्रिया है।

वृक्ष अपनी जड़ों को धरती में गहरे तक उतार देता है। धरती से यह रिश्ता ही उसे जीवनी शक्ति देता है। उसके अंदर प्राण का संचार करता है। उसे आंधी-तूफानों के सामने सीना तान कर खड़े होने का हौंसला देता है।

आंधी में ताकत है। वेग है। जो भी सामने आये उसे अपने साथ उड़ा ले जाने का जुनून है। सब कुछ तहस-नहस कर देने का माद्दा है।

कबीर ने आंधी के इस चरित्र को आध्यात्मिक रहस्यवाद में पिरोया है। माया के अंधेरे में ज्ञान का उजाला फैलाने की साधना भारत की ऋषि परम्परा में जीने वाले महापुरुष करते रहे हैं। ज्ञान की आंधी चला कर भ्रम की टाटी उड़ाने वाले को ही लोग गुरु मानते हैं। उनका अनुगमन करते हैं। मानते हैं कि वह गुरू ही उन्हें बेहतर जीवन का मार्ग दिखायेंगे। भ्रम दूर होगा, सत्य से साक्षात्कार होगा।

पश्चिम की दुनियां में ऐसे संतों का अब अकाल ही है, लेकिन भारत में आज भी सच्चा गुरु खोज लेना बहुत कठिन नहीं है। प्रोद्योगिकी के चलते इसमें और अधिक सुविधा हो गयी है। अब टेलीविजन पर देख कर ही लोग गुरु का चुनाव कर लेते हैं। गुरू भी इसी माध्यम से उनका मार्गदर्शन करते हैं।

लाखों लोग गत कुछ वर्षों से टीवी चैनलों पर देख कर गुरुदेव को अपना गुरू मान चुके थे। उनसे प्रेरणा लेकर वे सुबह-सुबह टीवी देख कर उनके द्वारा बतायी गयी यौगिक क्रियाओं को दोहरा कर अपनी स्थूल काया को कामचलाऊ बनाने में सफल रहे थे। योग के बीच में बाबा के वचन भी उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाई और राष्ट्रीय चेतना में सराबोर कर रहे थे।

सुबह का एक घंटा गुरुदेव को समर्पित कर दिन भर दुनियांदारी की तमाम तिकड़मों के बीच संतुलन बिठाते हुए लोग सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे। लेकिन यही स्थिति है जब माया घेरती है। माया ने अपना जाल रचा। गुरु और शिष्य, दोनों ही उस लोक की ओर बढ़ते-बढ़ते ठिठक गये। इस लोक में जब चारों ओर नजर घुमाई तो कष्ट में जीते, भूख और गरीबी से त्रस्त करोड़ों आकुल-व्याकुल लोगों को अपने चारों ओर पाया।

गुरुदेव ने नेत्र मूंदे और पता लगा लिया कि यह लोग भाग्य के मारे अभिशप्त लोग नहीं हैं। भगवान की इन पर पूरी कृपा है। इनकी सम्पत्ति का अपहरण तो उन सफेदफोशों ने किया है जिन्हें कलियुग में नेता और व्यापारी कहते हैं। इसी परमावस्था में उन्हें यह भी आभास हुआ कि उनमें भी परमात्मा की दिव्य अंश हैं और इस नाते भगवान की ‘परित्राणाय साधूनाम, विनाशाय च दुष्कृताम’ की प्रतिज्ञा पूरी करने का दायित्व उनका है। गुरुदेव ने देश भर में घूम-घूम परिवर्तन की अलख जगायी और जब उन्हें यह भरोसा हो गया कि अब युद्धभूमि तैयार हो चुकी है तो उन्होंने ‘धर्मसंस्थापनार्थाय’ युद्ध की घोषणा कर दी और देश भर में फैले अपने शिष्यों को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित दिव्य लीला का साक्षी बनने का निमंत्रण भेज दिया। द्वापर में धर्मयुद्ध का साक्षी बनने से वंचित सभी आत्माओं ने इस निमंत्रण को हाथों-हाथ लिया। नियत तिथि को लोगों के हुजूम रामलीला मैदान में जुटने लगे।

गुरुदेव ने भ्रष्टाचारियों का नाम ले-ले कर यज्ञकुंड में आहुतियां डालनी प्रारंभ कीं। इस लोक के महारथियों तक जब यज्ञ की ज्वालाएं पहुंचने लगीं तो सब व्याकुल हो गये। पहले उन्हें लगा कि मामला केवल सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांगने का है। प्रधानमंत्री ने गुरुदेव के प्रति आदर प्रकट करते हुए कहा कि देश में अब लोकतंत्र आ चुका है। सत्ता पर सबका हक है। लूट के माल में भी जो वाजिब हिस्सा बनता है उस पर समझौता हो सकता है। गुरुदेव ने इस विकृत सोच को धिक्कारते हुए हिस्सेदारी का प्रस्ताव वापस कर दिया।

प्रधानमंत्री ने स्थिति की गम्भीरता को समझा। वह समझ गया कि गुरुदेव का इरादा हिस्सेदारी नहीं रंगदारी वसूलने का है। प्रधानमंत्री स्वयं साधु स्वभाव का था और व्यर्थ के संघर्ष से बचता था। उसने पेट खराब होने का हवाला देते हुए ‘कंट्रोल रूम’ संभालने से इनकार कर दिया और मंत्रिमंडल को खुद ही कुछ जुगत लगाने को कहा।

मंत्रियों का एक दल ओढ़ी हुई विनम्रता के साथ गुरुदेव के पास गया और उनसे यज्ञ बन्द करने का निवेदन किया। गुरुदेव ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि एक समय भारत सोने की चिड़िया था जिसे वर्तमान शासन ने दरिद्र बना दिया है। बंद कमरे में मंत्रियों ने गुरुदेव के सामने सोने के पहाड़ और डॉलरों के झरनों का खाका खींचा और यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि नीतियां सही दिशा में जा रहीं हैं। उन्हें बताया गया कि हजारों साल पहले जिस प्रकार साधू नामक वैश्य की नौका में स्वर्णमुद्राएं भरी रहती थी किन्तु वह उसे लता-पत्रादि कहता था, वही स्थिति अब भी है। उन्होंने गुरुदेव को बाबा रामदेव का उदाहरण भी दिया जिनका सन्यासी होते हुए भी हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक साम्राज्य है। तमाम तर्कों के बाद भी गुरुदेव अविचलित रहे।

अब तक गुप्तचरों द्वारा मामला राजमहिषी के पास पहुंच चुका था। उन्होंने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए गालियां देने में प्रवीण सामंत को बुलाया और गुरुदेव को समझाने के लिये कहा। सामंत ने स्वयं जाने के बजाय अपने घर पर ही पत्रकारों को बुलाया और गुरुदेव के विरुद्ध गालियों की बौछार शुरू कर दी। उसने उनकी नासमझी पर व्यंग्य करते हे कहा कि समृद्धि सदैव से सामंतों के पास ही रही है। आज भी उन सहित सभी सामंत पूरी राजसी शान-शौकत के साथ रह रहे हैं। गुरुदेव जिन भिखारियों के लिये समृद्धि की मांग कर रहे हैं उनके पास वह कभी नहीं थी। सामंत ने यह भी याद दिलाया कि वे योग के गुरु हैं और उन्हें अपने शिष्यों को कंद-मूल-फल खाकर जीवित रहने का उपदेश देना चाहिये। इसके लिये समृद्धि की कोई जरूरत नहीं।

कहा गया है कि ज्ञान जहां से भी मिले लेना चाहिये। लेकिन माया प्रभावी होने के कारण गुरुदेव ने उनके द्वारा दिये जा रहे ज्ञान की ओर से आंखें फेर लीं। नतीजा यह हुआ कि वे सामंत के उपदेश में छिपी चेतावनी को भी न समझ सके। ‘ज्ञाननामाग्रगण्य’ गुरुदेव माया को न समझ सके और नारद जैसे मोह में पड़े रहे। इस मोहावस्था में ही उन्हें लगा कि वे मनुष्य से वृक्ष बन गये हैं। दूर कहीं काली आंधी उठी है और उनकी ओर बढ़ रही है। आंधी के थपेड़े उन्हें उखाड़ डालना चाहते हैं। छोटे-छोटे तिनके जो कल तक उनके ही अंग थे आज हवा के झोंकों पर सवार होकर उन पर प्रहार कर रहे हैं। अचानक वे जागे तो देखा हजारों पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान उनकी यज्ञशाला को घेर चुके थे। युद्ध का दृश्य सामने था। देखते ही देखते यज्ञशाला का विध्वंस हो गया। घायलों की कराह और महिलाओं और बच्चों का क्रंदन गूंज रहा था। मोहावस्था समाप्त हो चुकी थी। सूरज की पहली किरण ने मायाजाल को चीर दिया था। हरिद्वार में पावन गंगा के तट पर बैठे गुरुदेव सारी स्थिति पर चिंतन कर रहे थे। रात को आयी आंधी सच में ज्ञान की आंधी थी। उनके सभी भ्रम दूर हो चुके थे। भारत दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया है। लोकतंत्र में जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिये सरकार चुनी जाती है। वह देश को लोककल्याणकारी शासन देती है। इस शासन में सबको समान अधिकार प्राप्त होते हैं। सबको न्याय मिलता है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी जनता के सेवक होते हैं। सत्ता पर समाज का नियंत्रण होता है आदि सभी बातों की निस्सारता का वे अनुभव कर चुके थे।

भागीरथी का जल हाथ में लेकर उन्होंने आचमन किया तो सारा विचलन समाप्त हो चुका था। उन्हें याद आयी दो हजार वर्ष पूर्व की घटना जब इसी गंगा के तट पर पाटलिपुत्र में धननन्द द्वारा आर्य चाणक्य का भरे दरबार में अपमान किया था। वे समझ गये कि मदान्ध सत्ता के मूलोच्छेद का समय आ गया है। नये संकल्प के साथ वे अपने आश्रम की ओर बढ़ चले।

यह कथा आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व लिखी गयी थी। पुरातत्वविदों के अनुसार जिस शिलालेख पर यह कथा लिखी मिली है वह ईसा से लगभग 2011 वर्ष बाद का है। दिये गये विवरण से पता चलता है कि उस समय भारत में महिलाओं जैसा संकोची कोई पुरुष प्रधानमंत्री था। उसकी सत्ता से इतर पुरुषों की तरह दबंग एक अन्य महिला का विवरण भी मिलता है जो संभवतः मंत्रिमण्डल में न होते हुए भी सत्ता का केन्द्र थी। उसके जाति अथवा कुल-गोत्र का कोई विवरण नहीं प्राप्त होता है जबकि तत्कालीन भारत की राजनीति में जाति का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था।

जल ही जीवन

अवनीश सिंह

जल पर्यावरण का अभिन्न अंग है, मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है। जल की आवश्यकता केवल मनुष्य के लिए ही नहीं बल्कि उन सबको भी है, जिनमें प्राण हैं। चाहे वह पशु-पक्षी हों या फिर पेड-पौधे। पुरातन समय से ही जल की महत्ता को मानव ने जाना और समझा है। ऋग्वेद की रचनाओं में जल की स्तुति की गई है। इतिहास गवाह है कि विश्व के सभी देश विभिन्न नदियों एवं घाटियों की गोद में फले-फूले और विकसित हुए हैं।

देश की जिन नदियों में कभी पानी की निर्मल धारा बहती थी, आज वहां दुर्गध के भभके उठते रहते हैं। इन नदियों का पानी प्रदूषण के खतरे की सभी सीमाएं पार कर चुका है। भूजल स्तर के गिरने के साथ पेयजल जहरीला भी होता जा रहा है। रसातल की ओर लौट रहे इस पानी में कई तरह के खतरनाक रसायनों और खनिज तत्वों के घुलने से पीने के साफ पानी का भी टोटा हो गया है। देश के बहुत से हिस्सों में जमीन के नीचे का पानी पीने लायक नहीं रह गया है। उसमें अनेक विषैले रसायन और स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक धातुएं मिल चुकी हैं।

छोटी-बड़ी कई नदियों वाले उत्तर भारत में साफ पानी की भारी किल्लत है। लोगों के स्वास्थ्य पर अब इस दूषित पानी का असर लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। देश के बीस राज्यों में बहने वाली 38 प्रमुख नदियों की सफाई पर पिछले दस सालों में लगभग 26 अरब रुपये खर्च किए गए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। इन नदियों में यमुना, गंगा, गोमती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, दामोदर, महानंदा, सतलुज जैसी बड़ी नदियां शामिल हैं। इनमें से एक-एक नदी की सफाई के लिए संबंधित राज्यों को सैकड़ों करोड़ रुपये दिए गए। न तो आवंटित रकम कम थी और न ही एक दशक का समय छोटा कहा जा सकता है। फिर भी इन नदियों का पानी स्वच्छ होने के बजाय कई जगह जहरीला हो गया। उनमें पाई जाने वाली मछलियां और अन्य जीव-जंतु भी मर गए। ये तथ्य इस बात का इशारा करते हैं कि पैसा जरूर पानी की तरह बहाया गया, पर वह निर्धारित मकसद में नहीं लगा।

ग्रामीण पेयजल आपूर्ति की हालत और भी खराब है। खासतौर से उत्तरी राज्यों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति का सिर्फ पांच फीसदी सरकारी योजनाओं पर निर्भर है। बाकी 95 फीसदी पेयजल के लिए लोग कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन भूजल स्तर के नीचे खिसकने से ज्यादातर कुएं भी सूख गए हैं। उनकी जगह हैंडपंप और नलकूपों ने ले ली है। इन माध्यमों से निकल रहा पानी गुणवत्ता की दृष्टि से जहर से कम नहीं है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश के ग्रामीण क्षेत्रों में 85 फीसदी पेयजल का स्त्रोत भूजल है। इसके बावजूद ज्यादातर लोगों के लिए दूषित पेयजल पीना उनकी नियति बन गई है।

आज देश का एक भी विकास खण्ड भूजल की दृष्टि से सुरक्षित नहीं है। आजादी के वक्त 232 गांव संकटग्रस्त थे। आज दो लाख से ज्यादा यानी हर तीसरा गांव पानी की चुनौती से जूझ रहा हैं। देश के 70 फीसदी भूजल भंडारों पर चेतावनी की छाप साफ देखी जा सकती है। पिछले 16 वर्षों में 300 से ज्यादा जिलों के भूजल में चार मीटर से ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है। जम्मू, हिमाचल, से लेकर सबसे ज्यादा बारिश वाले चेरापूंजी तक में पेयजल का संकट हैं। पंजाब के भी करीब 40 से अधिक ब्लॉक डार्क जोन हैं। बेचने के लिए पानी के दोहन ने दिल्ली में अरावली के आसपास जलस्तर 25 से 50 मीटर गिरा दिया है। राजस्थान के अलवर-जयपुर में एक दशक पहले ही अति दोहन वाले उद्योगों को प्रतिबंधित कर देना पड़ा था। उत्तर प्रदेश के 820 में से 461 ब्लॉकों का पानी उतर रहा है। मध्य प्रदेश के शहरों का हाल तो बेहाल है ही, सुदूर बसे कस्बों में भी आज 600-700 फीट गहरे नलकूप हैं। सब जगह पानी का संकट है।

नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की कई योजनाएं चल रही हैं, लेकिन दो हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी गंगा मैली की मैली ही है। हरिद्वार से हुगली तक उसका पानी आचमन लायक भी नहीं रहा। दूसरी नदियों का हाल तो और भी बुरा है। सरकारी सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार भूजल में रासायनिक प्रदूषण के अलावा स्वास्थ्य के लिए घातक खनिज तत्व घुले हैं। भूजल में ये तत्व प्राकृतिक रूप से मिले हुए हैं। रासायनिक उर्वरक और सीवरेज से भूजल में नाइट्रेट घुल रहा है। पानी में इसकी मात्रा लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा फ्लोराइड और आर्सेनिक की मात्रा प्राकृतिक रूप से घुली है। इसे पीने के लायक स्वच्छ बनाना बहुत सरल नहीं है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस प्रदूषण को रोकने या खत्म करने के लिए भारी भरकम बजट वाली योजनाएं बनी हैं। इन योजनाओं पर अरबों रुपये भी खर्च भी किए जा चुके हैं, लेकिन सफाई के मामले में इसकी हालत ज्यों की त्यों है। यह देखकर अचरज होता है कि आखिर हमारा सरकारी तंत्र करता क्या है? इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए बारिश के ज्यादा से ज्यादा पानी के संचयन की जरूरत है। सरकारी एजेंसियां भी मानती हैं कि खतरनाक तत्वों को पानी से अलग करने की कारगर तकनीक का देश में अभाव है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की 7067 बस्तियों के निवासी आर्सेनिक और 29070 बस्तियों के लोग फ्लोराइड युक्त भूजल पीने को मजबूर हैं। एक लाख से ज्यादा बस्तियों के लोग लौह तत्व घुले भूजल पर गुजारा कर रहे हैं। इन बस्तियों के लोगों के पास पेयजल का कोई और विकल्प नहीं है।

जेठ के इस महीने में सब तरफ पानी की ही चर्चा। पानी-पानी चिल्लाते लोग! पानी के लिए झगडा-मारपीट! लेकिन पानी है कहां? सूखते चेहरे, सूखती नदियां-कुएं-तालाब-झीलें! चटकती धरती और पानी की टूटती परंपराएं व कानून! सब कुछ जैसे बेपानी होने को लालायित है। यह है महाशक्ति बनने का दंभ भरता भारत! पर ताज्जुब है कि आज अपनी इस नाकामी पर कोई भी पानी-पानी होता नजर नहीं आता; न समाज, न सरकार, न नेता और न ही अफसर।

इस समस्या से बचने का एक ही रास्ता है कि नागरिक उठ खड़े हों और जल स्रोतों को गंदा करने वाले कल-कारखानों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दें। पर्यावरण की सुरक्षा आज इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। अब आज और कल के मनुष्य का अस्तित्व इसी पर निर्भर है। संतोष की बात है कि इस संदर्भ में अदालतें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, लेकिन यह जनता का भी काम है कि वह अपनी नदियों को साफ-सुथरा रखे।

सत्याग्रह के दमन से नहीं खत्म होंगे सवाल

संजय द्विवेदी

दिल्ली में बाबा रामदेव और उनके सहयोगियों के साथ जो कुछ हुआ, वही दरअसल हमारी राजसत्ताओं का असली चेहरा है। उन्हें सार्थक सवालों पर प्रतिरोध नहीं भाते। अहिंसा और सत्याग्रह को वे भुला चुके हैं। उनका आर्दश ओबामा का लोकतंत्र है जो हर विरोधी आवाज को सीमापार भी जाकर कुचल सकता है। दिल्ली की ये बेदिली आज की नहीं है। आजादी के बाद हम सबने ऐसे दृश्य अनेक बार देखे हैं। किंतु दिल्ली ऐसी ही है और उसके सुधरने की कोई राह फिलहाल नजर नहीं आती। कल्पना कीजिए जो सरकारें इतने कैमरों के सामने इतनी हिंसक, अमानवीय और बर्बर हो सकती हैं, वे बिना कैमरों वाले समय में कैसी रही होंगी। ऐसा लगता है कि आजादी, हमने अपने बर्बर राजनीतिक, प्रशासनिक तंत्र और प्रभु वर्गों के लिए पायी है। आप देखें कि बाबा रामदेव जब तक योग सिखाते और दवाईयां बेचते और संपत्तियां खड़ी करते रहे,उनसे किसी को परेशानी नहीं हुयी। बल्कि ऐसे बाबा और प्रवचनकार जो हमारे समय के सवालों से मुठभेड़ करने के बजाए योग, तप, दान, प्रवचन में जनता को उलझाए रखते हैं- सत्ताओं को बहुत भाते हैं। देश के ऐसे मायावी संतों, प्रवचनकारों से राजनेताओं और प्रभुवर्गों की गलबहियां हम रोज देखते हैं। आप देखें तो पिछले दस सालों में किसी दिग्विजय सिंह को बाबा रामदेव से कोई परेशानी नहीं हुयी और अब वही उन्हें ठग कह रहे हैं। वे ठग तब भी रहे होंगें जब चार मंत्री दिल्ली में उनकी आगवानी कर रहे थे। किंतु सत्ता आपसे तब तक सहज रहती है, जब तक आप उसके मानकों पर खरें हों और वह आपका इस्तेमाल कर सकती हो। सत्ताओं को नहीं भाते कठिन सवालः निश्चित ही बाबा रामदेव जो सवाल उठा रहे हैं वे कठिन सवाल हैं। हमारी सत्ताओं और प्रभु वर्गों को ये सवाल नहीं भाते। दिल्ली के भद्रलोक में यह गंवार, अंग्रेजी न जानने वाला गेरूआ वस्त्र धारी कहां से आ गया? इसलिए दिल्ली पुलिस को बाबा का आगे से दिल्ली आना पसंद नहीं है। उनके समर्थकों को ऐसा सबक सिखाओ कि वे दिल्ली का रास्ता भूल जाएं। किंतु ध्यान रहे यह लोकतंत्र है। यहां जनता के पास पल-पल का हिसाब है। यह साधारण नहीं है कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे को नजरंदाज कर पाना उस मीडिया के लिए भी मुश्किल नजर आया, जो लाफ्टर शो और वीआईपीज की हरकतें दिखाकर आनंदित होता रहता है। बाबा रामदेव के सवाल दरअसल देश के जनमानस में अरसे से गूंजते हुए सवाल हैं। ये सवाल असुविधाजनक भी हैं। क्योंकि वे भाषा का भी सवाल उठा रहे हैं। हिंदी और स्थानीय भाषाओं को महत्व देने की बात कर रहे हैं। जबकि हमारी सरकार का ताजा फैसला लोकसेवा आयोग द्वारा आयोजित की जाने वाली सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अंग्रेजी का पर्चा अनिवार्य करने का है। यानि भारतीय भाषाओं के जानकारों के लिए आईएएस बनने का रास्ता बंद करने की तैयारी है। ऐसे कठिन समय में बाबा दिल्ली आते हैं। सरकार हिल जाती है क्योंकि सरकार के मन में कहीं न कहीं एक अज्ञात भय है। यह असुरक्षा ही कपिल सिब्बल से वह पत्र लीक करवाती है ताकि बाबा की विश्वसनीयता खंडित हो। उन पर अविश्वास हो। क्योंकि राजनेताओं को विश्वसनीयता के मामले में रामदेव और अन्ना हजारे मीलों पीछे छोड़ चुके हैं। आप याद करें इसी तरह की विश्वसनीयता खराब करने की कोशिश में सरकार से जुड़े कुछ लोग शांति भूषण के पीछे पड़ गए थे। संतोष हेगड़े पर सवाल खड़े किए गए, क्योंकि उन्हें अन्ना जैसे निर्दोष व्यक्ति में कुछ ढूंढने से भी नहीं मिला। लेकिन निशाने पर तो अन्ना और उनकी विश्वसनीयता ही थी। शायद इसीलिए अन्ना हजारे ने सत्याग्रह शुरू करने से पहले रामदेव को सचेत किया था कि सरकार बहुत धोखेबाज है उससे बचकर रहना। काश रामदेव इस सलाह में छिपी हुयी चेतावनी को ठीक से समझ पाते तो उनके सहयोगी बालकृष्ण होटल में मंत्रियों के कहने पर वह पत्र देकर नहीं आते। जिस पत्र के सहारे बाबा रामदेव की तपस्या भंग करने की कोशिश कपिल सिब्बल ने प्रेस कांफ्रेस में की। बिगड़ रहा है कांग्रेस का चेहराः बाबा रामदेव के सत्याग्रह आंदोलन को दिल्ली पुलिस ने जिस तरह कुचला उसकी कोई भी आर्दश लोकतंत्र इजाजत नहीं देता। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और घरना देने की सबको आजादी है। दिल्ली में जुटे सत्याग्रहियों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था कि उन पर इस तरह आधी रात में लाठियां बरसाई जाती या आँसू गैस के गोले छोड़ जाते। किंतु सरकारों का अपना चिंतन होता है। वे अपने तरीके से काम करती हैं। यह कहने में कोई हिचक नहीं कि इस बर्बर कार्रवाई से केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी प्रतिष्ठा गिरी है। एक तरफ सरकार के मंत्री लगातार बाबा रामदेव से चर्चा करते हैं और एक बिंदु पर सहमति भी बन जाती है। संभव था कि सारा कुछ आसानी से निपट जाता किंतु ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी कि सरकार को यह दमनात्मक रवैया अपनाना पड़ा। इससे बाबा रामदेव का कुछ नुकसान हुआ यह सोचना गलत है। कांग्रेस ने जरूर अपना जनविरोधी और भ्रष्टाचार समर्थक चेहरा बना लिया है। क्योंकि आम जनता बड़ी बातें और अंदरखाने की राजनीति नहीं समझती। उसे सिर्फ इतना पता है कि बाबा भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं और यह सरकार को पसंद नहीं है। इसलिए उसने ऐसी दमनात्मक कार्रवाई की। जाहिर तौर पर इस प्रकार का संदेश कहीं से भी कांग्रेस के लिए शुभ नहीं है। बाबा रामदेव जो सवाल उठा रहे हैं, उसको लेकर उन्होंने एक लंबी तैयारी की है। पूरे देश में सतत प्रवास करते हुए और अपने योग शिविरों के माध्यम से उन्होंने लगातार इस विषय को जनता के सामने रखा है। इसके चलते यह विषय जनमन के बीच चर्चित हो चुका है। भ्रष्टाचार का विषय आज एक केंद्रीय विषय बन चुका है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे जैसे दो नायकों ने इस सवाल को आज जन-जन का विषय बना दिया है। आम जनता स्वयं बढ़ती महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है। राजनीतिक दलों और राजनेताओं से उसे घोर निराशा है। ऐसे कठिन समय में जनता को यह लगने लगा है कि हमारा जनतंत्र बेमानी हो चुका है। यह स्थिति खतरनाक है। क्योंकि यह जनतंत्र, हमारे आजादी के सिपाहियों ने बहुत संर्धष से अर्जित किया है। उसके प्रति अविश्वास पैदा होना या जनता के मन में निराशा की भावनाएं पैदा होना बहुत खतरनाक है। अन्ना या रामदेव के पास खोने को क्या हैः बाबा रामदेव या अन्ना हजारे जैसी आवाजों को दबाकर हम अपने लोकतंत्र का ही गला घोंट रहे हैं। आज जनतंत्र और उसके मूल्यों को बचाना बहुत जरूरी है। जनता के विश्वास और दरकते भरोसे को बचाना बहुत जरूरी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारे राजनीतिक दल अगर ईमानदार प्रयास कर रहे होते तो ऐसे आंदोलनों की आवश्यक्ता भी क्या थी? सरकार कुछ भी सोचे किंतु आज अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जनता के सामने एक आशा की किरण बनकर उभरे हैं। इन नायकों की हार दरअसल देश के आम आदमी की हार होगी। केंद्र की सरकार को ईमानदार प्रयास करते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ काम करते हुए दिखना होगा। क्योंकि जनतंत्र में जनविश्वास से ही सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। यह बात बहुत साफ है कि बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के पास खोने के लिए कुछ नहीं हैं, क्योंकि वे किसी भी रूप में सत्ता में नहीं हैं। जबकि कांग्रेस के पास एक सत्ता है और उसकी परीक्षा जनता की अदालत में होनी तय है, क्या ऐसे प्रसंगों से कांग्रेस जनता का भरोसा नहीं खो रही है, यह एक लाख टके का सवाल है। आज भले ही केंद्र की सरकार दिल्ली में रामलीला मैदान की सफाई करके खुद को महावीर साबित कर ले किंतु यह आंदोलन और उससे उठे सवाल खत्म नहीं होते। वे अब जनता के बीच हैं। देश में बहस चल पड़ी है और इससे उठने वाली आंच में सरकार को असहजता जरूर महसूस होगी। केंद्र की सरकार को यह समझना होगा कि चाहे-अनचाहे उसने अपना चेहरा ऐसा बना लिया है जैसे वह भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी संरक्षक हो। क्योंकि एक शांतिपूर्ण प्रतिरोध को भी अगर हमारी सत्ताएं नहीं सह पा रही हैं तो सवाल यह भी उठता क्या उन्हें हिंसा की ही भाषा समझ में आती है ? दिल्ली में अलीशाह गिलानी और अरूँधती राय जैसी देशतोड़क ताकतों के भारतविरोधी बयानों पर जिस दिल्ली पुलिस और गृहमंत्रालय के हाथ एक मामला दर्ज करने में कांपते हों, जो अफजल गुरू की फांसी की फाईलों को महीनों दबाकर रखती हो और आतंकियों व अतिवादियों से हर तरह के समझौतों को आतुर हो, यहां तक कि वह देशतोड़क नक्सलियों से भी संवाद को तैयार हो- वही सरकार एक अहिंसक समूह के प्रति कितना बर्बर व्यवहार करती है। बाबा रामदेव इस मुकाम पर हारे नहीं हैं, उन्होंने इस आंदोलन के बहाने हमारी सत्ताओं के एक जनविरोधी और दमनकारी चेहरे को सामने रख दिया है। सत्ताएं ऐसी ही होती हैं और इसलिए समाज को एकजुट होकर एक सामाजिक दंडशक्ति के रूप में काम करना होगा। यह तय मानिए कि यह आखिरी संघर्ष है, इस बार अगर समाज हारता है तो हमें एक लंबी गुलामी के लिए तैयार हो जाना चाहिए। यह गुलामी सिर्फ आर्थिक नहीं होगी, भाषा की भी होगी, अभिव्यक्ति की होगी और सांस लेने की भी होगी। रामदेव के सामने भी रास्ता बहुत सहज नहीं है,क्योंकि वे अन्ना हजारे नहीं हैं। सरकार हर तरह से उनके अभियान और उनके संस्थानों को कुचलने की कोशिश करेगी। क्योंकि बदला लेना सत्ता का चरित्र होता है। इस खतरे के बावजूद अगर वे अपनी सच्चाई के साथ खड़े रहते हैं तो देश की जनता उनके साथ खड़ी रहेगी, इसमें संदेह नहीं है। बाबा रामदेव ने अपनी संवाद और संचार की शैली से लोगों को प्रभावित किया है। खासकर हिंदुस्तान के मध्यवर्ग में उनको लेकर दीवानगी है और अब इस दीवानगी को, योग से हठयोग की ओर ले जाकर उन्होंने एक नया रास्ता पकड़ा है। यह रास्ता कठिन भी है और उनकी असली परीक्षा दरअसल इसी मार्ग पर होनी हैं। देखना है कि बाबा इस कंटकाकीर्ण मार्ग पर अपने साथ कितने लोगों को चला पाते हैं? (लेखक : माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

सोमवार, 23 मई 2011

तुष्टीकरण की बलि चढ़ेगा देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र

आशुतोष

पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव एक बड़े राजनैतिक बदलाव की ओर संकेत कर रहे हैं, यह दावा किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल और केरल में वामपंथियों का वर्चस्व टूटा तो तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। असम में कांग्रेस अपनी सरकार को बचाने में कामयाब रही वहीं कर्नाटक और आंध्र के उपचुनाव के परिणाम कांग्रेस को चेतावनी दे रहे हैं।

इन परिणामों को लोकसभा चुनाव का पूर्वाभ्यास, परिवर्तन की बयार, भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनादेश आदि कह कर महिमामंडित किया जा रहा है। असम छोड़ कर सभी राज्यों में होने वाला परिवर्तन प्रथमदृष्टया ऐसा आभास भी देता है। कुछ लोग इसे दिल्ली में अन्ना हजारे के नेतृत्व में हुई अहिंसक क्रांति की फलश्रुति के रूप में भी प्रस्तुति कर रहे हैं और इसके पूरे देश में दोहराये जाने का दावा कर रहे हैं। अन्य अनेक राजनैतिक और सामाजिक नेता और संगठन, जो बदलाव के निजी अभियान चला रहे हैं, का उत्साह भी इन परिणामों से बढ़ा है।

पश्चिम बंगाल में हुए सत्ता परिवर्तन के संकेत पहले ही दिखने लगे थे लेकिन इतनी जबरदस्त जीत की उम्मीद स्वयं ममता बनर्जी को भी नहीं थी। वामपंथी कुशासन के विरुद्ध ममता एक प्रतीक बन गयी थीं। इस ऐतिहासिक विजय का पूरा श्रेय उनकी अनथक मेहनत और जुझारूपन को है। यह उनकी नितांत व्यक्तिगत जीत है जिसे बंगाल की जनता ने अपना समर्थन देकर पूरा किया।

वस्तुतः यह संघर्ष राष्ट्रीय दल और पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा होने के नाते कांग्रेस अथवा राष्ट्रवादी विचार के प्रतिनिधि के रूप में भारतीय जनता पार्टी का राजनैतिक संकल्प होना चाहिये था जिसे ममता ने अपने हौंसले और जिद की दम पर हासिल किया है। परिवर्तन की यह लड़ाई अन्य राज्यों से अलग और उल्लेखनीय है। अन्य राज्यों की तरह यहां न तो मतदाताओं को उपहार बांटे गये थे और न ही बाजार द्वारा गढ़े गये विकास के लुभावने नारों का ही इस्तेमाल किया गया था।

मां, माटी और मानुष के सम्मान जैसी कोमल संवेदना में भी परिवर्तन की ऊर्जा छिपी है इसे ममता ने न केवल पहचाना, बल्कि उसे राजनीति से दूर गांव-गली तक पहुंचाया भी। विकास के नाम पर अपनी मुनाफाखोरी को आवश्यक साबित करने वाले बाजार की शक्तियों को तो वे सिंगूर और नंदीग्राम के समय ही आइना दिखा चुकी थीं।

हालांकि राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश करने की आतुरता में ममता ने भी कुछ समझौते किये हैं । आने वाला समय ही बतायेगा कि उन्हें इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी। इस आतुरता में उन्होंने जहां एक ओर माओवादियों-नक्सलवादियों का सहारा लिया है तो दूसरी ओर पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, उद्योगपतियों आदि से भी हाथ मिलाया है। बड़ी मात्रा में मुस्लिम मत भी उनके खाते में गये हैं जिनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी काफी संख्या है। कल तक अपनेआप को कलाकारों, साहित्यकारों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाशास्त्रियों आदि के रूप में प्रस्तुत करने वाले अनेक कॉमरेडों ने भी समय की नजाकत को देखते हुए ममता की विरुदावली गानी शुरू कर दी थी। जश्न खत्म होने पर वे भी अपना इनाम मांगेंगे। इन सबको एक साथ साध पाना, साथ ही मतदाताओं की आकांक्षाओं को पूरा करना, यह सरल काम नहीं है।

जनता जब इतना स्पष्ट जनादेश देती है तो लम्बे समय तक धैर्य रखने को तैयार नहीं होती। उसे अब परिवर्तन के नारे से नहीं बहलाया जा सकता। परिवर्तन होता दिखना भी जरूरी होता है। इसलिये ममता को सच का सामना करने के लिये भी तैयार हो जाना चाहिये।

राज्य का खजाना खाली है और समस्याओं का अंबार लगा है। कम्युनिस्ट कैडर द्वारा उगाही के अर्थशास्त्र और नीतिगत भ्रष्टाचार को वाम गठबंधन द्वारा जिस प्रकार संस्थागत रूप दिया जा चुका है उसका तिलस्म तोड़ना कोई हंसी-खेल नहीं है। अगर ममता इसे जारी रहने देती हैं तो वे अपने मतदाताओं का विश्वास खो देंगी। यदि वे इसे उखाड़ फेंकने की कोशिश करेंगी तो लाखों कम्युनिस्ट कैडर को बेरोजगार कर अपने खिलाफ अराजकता की आंधी को आमंत्रित करेंगी। इसका तीसरा और सबसे खतरनाक किन्तु प्रायः अवश्यंभावी पहलू है उनके अपने ही कार्यकर्ताओं का भारी दवाब।

जब भी ऐसे व्यापक परिवर्तन हुए हैं, देखने में आता है कि सत्ता संभालने वाले दल के कार्यकर्ता, जो लम्बे समय तक अपने नेता के कहने पर संघर्ष करते हैं, लाठी-गोली खाते हैं, अपने कैरियर दांव पर लगाते हैं, इस स्थिति में सत्ता में अपनी हिस्सेदारी मांगते हैं। मंत्री, विधायक, सांसद बनाये जाने की सीमा होती है। वह सबको नहीं दी जा सकती। तब मांग उठती है भ्रष्टाचार के उस तंत्र को उखाड़ फेंकने के बजाय उसे बनाये रखने और उसके पायेदारों के रूप में डटे पिछले सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं को हटाकर नये सत्ता में आये दल के कार्यकर्ताओं को वहां स्थापित करने की।

यह वह क्षण होता है जब अधिकांश नेतृत्व राजनैतिक मजबूरी के चलते अपने समर्थकों के सामने नतमस्तक होता है और भ्रष्ट व्यवस्था को अभयदान मिल जाता है। यही वह क्षण होता है जब किसी भी परिवर्तन की निरर्थकता की इबारत का पहला अक्षर लिखा जाता है। यही वह क्षण होता है जब समझौते न करने के कारण ऊंचाई और प्रतिष्ठा पाने वाला व्यक्ति समझौता कर अपनी पहचान गंवाता है। इसके आगे समझौते ही उसकी नियति बन जाते हैं। और यदि वह समझौते नहीं करता, तो अपने उन कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल लेनी होती है जो पूरे संघर्ष में कदम-कदम पर उसके साथ खड़े थे।

पश्चिम बंगाल में समस्याएं बेहद विकराल है। पड़ोसी देश से होने वाली घुसपैठ से ममता कैसे निपटेंगी। भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक संघर्ष, नक्सलवाद जैसी चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। ममता के पास विश्राम का समय नहीं होगा। तुरंत परिणाम पाने की जनाकांक्षा उन्हें लगातार दवाब में रखेगी। लेकिन अपने जीवट के बल पर ममता इस जनाकांक्षा को तृप्त कर पायेंगी, उनके व्यक्तित्व को जानने वाला कोई भी यह विश्वास व्यक्त कर सकता है। यह ममता की सफलता के लिये ही नहीं बल्कि पूरे देश में बन रहे परिवर्तन के वातावरण को बनाये रखने के लिये भी बेहद जरूरी है।

तमिलनाडु और पुड्डुचेरी की राजनीति आमतौर पर एक जैसे रुझान प्रदर्शित करती रही है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच सत्ता का लेन-देन भी चलता रहा है। दोनों ही दलों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। पिछली बार जब तमिलनाडु की जनता ने जयललिता को सत्ता से बेदखल किया था तो उनकी अकूत सम्पत्ति और तुनकमिजाजी के किस्से हफ्तों तक पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियां बनते रहे थे। करुणानिधि के कुनबे ने उनके कीर्तिमान को तोड़ा है।

तमिलनाडु के सत्ता परिवर्तन को किसी भी तरह परिवर्तन की बयार साबित नहीं किया जा सकता। ज्यादा से ज्यादा इसे राज्य की जनता के सामने विकल्पहीनता की खीझ का प्रकटीकरण मान सकते हैं। उनके सामने दो बुराइयों में से एक को चुनने का विकल्प रखा गया था और उन्होंने सामने मौजूद बुराई को हटा कर दूसरी के लिये रास्ता बना दिया। करुणानिधि के सहारे केन्द्र में कांग्रेसनीत गठबंधन चल रहा है। अभी तक के सबसे बड़े टूजी घोटाले में द्रमुक के मंत्री राजा के साथ ही करुणानिधि की बेटी भी शामिल हैं। उन्हें विस्थापित कर सत्ता में आने वाली जयललिता को भी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने में ऐतराज नहीं है। यह सिद्धांतों की नहीं सुविधाओं की राजनीति है।

केरल का चुनाव भी हालात के बदलने का विश्वास नहीं दिलाते। कम्युनिस्ट पार्टी की भीतरी लड़ाई में उसकी कुछ सीटें कम हुई हैं। लेकिन फिर भी कांग्रेस को मिली 38 सीटों के मुकाबले 45 सीटे लेकर माकपा उससे कहीं आगे है। सच तो यह है कि दिल्ली में सांप्रदायिकता को गाली देने वाली कांग्रेस केरल में मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ कर चुनाव लड़ती है। अपने दम पर बहुमत के लिये आवश्यक 71 सीटों से कांग्रेस बहुत पीछे है किन्तु 2006 में 7 सीटों के मुकाबले 2011 में 20 सीटें पाकर मुस्लिम लीग ने गठबंधन को सत्ता तक पहुंचा दिया।

असम के चुनावों में तरुण गोगोई की तीसरी बार विजय को कांग्रेस उपलब्धि की तरह प्रस्तुत कर रही है। राज्य की जनसांख्यिकी का अध्ययन करने वाले जानते हैं कि वहां की राजनीति अब असम के मूल निवासियों के हाथों से प्रायः निकल चुकी है।

अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में बांग्लादेशी घुसपैठिये चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में आ चुके हैं। कांग्रेस ने इन घुसपैठियों को बड़े जतन से पाला है। उन्हें रहने को जमीनें, नागरिकता, पहचान पत्र आदि सुलभ कराये हैं। साथ ही उन्हें यह भी याद दिलाये रखा जाता है कि यदि कोई और सरकार आयी तो उनकी आव-भगत में कमी हो सकती है। हालात यहां तक आ पहुंचे हैं कि कुछ समय पहले एक राष्ट्रीय चैनल पर मध्य आसाम में फहराते पाकिस्तान के झण्डे के वीडियो प्रसारित होने वाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। घुसपैठ पर यदि कोई नियंत्रण नहीं किया गया तो संभव है कि अगले चुनावों में असम विधानसभा से व्यावहारिक रूप से प्रतिपक्ष गायब ही हो जाय।

इन परिस्थितियों में हालिया चुनाव परिणामों को किसी परिवर्तन का संकेत समझ लेना गलतफहमी से ज्यादा नहीं हो सकता । लेकिन इन परिणामों के निहितार्थ का केन्द्र की राजनीति के संदर्भ में विष्लेषण करने पर दो चेतावनियां उभरती हैं। पहली, केन्द्र में सत्ता संभाल रही कांग्रेस ने सारी सीमाएं तोड़ कर मुस्लिम तुष्टीकरण की जिस रणनीति पर काम किया उसके परिणाम अब दिखने लगे हैं। धुर दक्षिण में केरल से लेकर पूर्व में असम तक वह मुस्लिम समर्थन जुटाने और उसके बल पर सरकार बनाने में कामयाब रही है। निश्चित ही उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को खुश करने के लिये जिस तरह दिग्विजय सिंह ने ओसामा की मौत पर संवेदना प्रकट की है वह बताता है कि कांग्रेस अपनी तुष्टीकरण की नीति के अगले चरण में कहां तक जा सकती है। इसमें यह चेतावनी छिपी है कि अब अन्य राजनैतिक दल भी इस मंत्र को आजमायेंगे और देश का धर्मनिरपेक्ष चरित्र इस तुष्टीकरण की बलि चढ़ेगा।

दूसरी चेतावनी प्रतिपक्ष के सबसे बड़े दल भाजपा के लिये है जो इन चुनावों में अपना पिछला प्रदर्शन भी न दोहरा सकी। निस्संदेह यह उसके लिये आत्ममंथन का अवसर है। देश की धर्मनिरपेक्षता पर कोई आंच न आये यह प्रतिपक्ष की भी जिम्मेदारी है। यदि केन्द्र में सत्तारूढ़ दल इस राष्ट्रीय चरित्र को ही बदल देने पर आमादा है तो प्रतिपक्ष को अपनी भूमिका निभानी ही होगी।Post templates

स्वभाषा में विज्ञान की शिक्षा एवं शोध: राष्ट्रहित में आवश्यक !

डा0 नागेश ठाकुर

यदि हमें अपने वर्तमान समय को संक्षेप में परिभाषित करना हो तो कहेंगे कि हम वैश्वीकरण, उदारीकरण और भूण्डलीकरण के परिणामस्वरूप उभरते विश्व-ग्राम में रह रहे है । आज पूरा विश्व एक विशाल बाजार बन गया है जहां हर राष्ट्र अपना सामान बेचने के लिए समान घरातल पर प्रतियोगिता में लगा है। यह युग उदारीकरण का इसी अर्थ में है क्योंकि राष्ट्रों की भौगोलिक सीमाओं के कारण आर्थिक प्रतिबन्धों को समाप्त अथवा उदार कर दिया गया है, तटकर अथवा आयातकर कम से कम किए जा रहे हैं। यह युग विश्व-ग्राम इस अर्थ में बन गया है कि आज न केवल दूरियां सिमट गई है, आवागमन के साधन व्यापक एवं सस्ते हो गए हैं बल्कि सूचनाओं का आदान-प्रदान सस्ता एवं सर्व-सुलभ हो गया है। आज दूरदर्शन, अन्तर्जाल (इंटरनेट) तथा ई-मेल आदि के द्वारा हम हर क्षण एक दूसरे से जुड़े रह सकते हैं तथा वीडियो- कान्फ्रेसिंग आदि के माध्यम से साक्षात बातचीत भी कर सकते हैं। हम तेजी से बदलते, निर्मम प्रतियोगिता के युग में जी रहे हैं। प्रश्न उठता है कि ऐसे युग में स्वभाषाऔर स्वदेशकी बात करना क्या उचित होगा ? क्या राष्ट्रवाद की बात करना इस अंतर्राष्ट्रवाद के युग में प्रासंगिक ( त्मसमअंदज) है ?

मेरा यह मानना है कि आज अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपने राष्ट्र तथा अपनी जातीय पहचान को समझना जितना आज जरूरी हे उतना पहले के किसी युग में नहीं था। पहला कारण तो यह है कि सूचना-प्रोद्योगिकी के विकास से जहां ज्ञान के भण्डार खुले हैं, सूचनाओं का आदान प्रदान तीव्र हुआ है वहीं पर हर राष्ट्र के सामने अपनी अस्मिता (प्कमदजपजल) एवं अस्तित्व (म्गपेजमदबम) को बचाने की चुनौती भी आई है अतीत में सांस्कृतिक आदान-प्रदान सीमित स्तर पर होता था परन्तु आज दूरदर्शन और अन्तर्जाल के द्वारा विश्वभर की संस्कृतियां अपने टेलीविजन के पर्दे पर अथवा कम्प्यूटर पर नृत्य करती दिखाई पड़ती है। विश्व की संस्कृतियां आज एक दूसरे के सामने ही नहीं आई बल्कि एक दूसरे पर हावी होने का प्रयास भी कर हरी है। जो संस्कृति विश्व पर हावी होगी, उसी का माल बिकेगा, वही समृद्ध होगी। यदि पश्चिमी संस्कृति प्रभावी होगी तो दीवाली, होली पर लडडू, बर्फी, जलेबी अथवा मठरी की जगह चौकलेट, बर्गर, पीजा, केक अथवा तरह-तरह के बिस्कुट ही भेंट में दिए जाने लगेगें और घर-घर में उनका प्रचार होगा।

सदियों से जिन मिठाईयों का अविष्कार हमारी संस्कृति ने किया वह समाप्त हो जाऐंगी। गुणवत्ता अथवा उपयोगिता में कम होने के कारण यह नष्ट नहीं होगी, सांस्कृतिक पराजय के कारण होगी । यह भी हो सकता है कि दीवाली, होली जैसे त्योहार हम भूल जाएं तथा हम केवल वेलेंनटाईन-डे ही मनाते रह जाऐं। आज की आर्थिक चुनौतियां हर राष्ट्र को निर्ममतापूर्वक दूसरे राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने के लिए उतेजित कर रही है ताकि उसके आर्थिक हित सुरक्षित हो सकें। आज यह स्पष्ट है कि तकनीकी, आर्थिक और सैनिक वर्चस्व के चलते पश्चिम पूरे विश्व पर हावी होने जा रहा है। जिस आर्थिक उदारीकरण में विश्व-कल्याण खोजा जा रहा है वह आर्थिक साम्राजयवादहै जो कि केवल पश्चिम के हितों की रक्षा करने के लिए ही खड़ा किया गया है। आर्थर डंकल के डंकल प्रस्तावों पर खड़ा वैश्वीरकण वास्तव में पश्चिमीकरण है। ऐसी स्थिति में विकासशील राष्ट्रों के सामने अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने, उसे दृढ़ करने के सिवाए उपाये क्या है? यह सांस्कृतिक पहचान ही हमे आर्थिक रूप से सही दिशा में विकास का मार्ग दिखाएगी। आज भारत के लिए वह निर्णायक क्षण आ गया है कि वह अपनी पहचान केवल मेरा भारत महानके नारे से ही न दे बल्कि हमारी महानता का आधार क्या रहा है, क्या हो सकता है उसकी भी खोज करें और जन-जन को उससे जोड़ें। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के अनुसार भारत को यदि अपने को विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा करना है तो अपनी पहचान को स्थापित करना ही होगा।

किसी भी राष्ट्र की उन्नति या विकसित होना उस राष्ट्र के प्रति व्यक्ति के जीवन स्तर एवं जीवन मुल्यों के आधार पर आंकी जा सकती है। ऐसा राष्ट्र जो आत्मनिर्भर हो, जन-जन खुशहाल हो, जहां उसकी संस्कृति सुरक्षित हा,े ऐसा राष्ट्र ही वास्तव में विकसित राष्ट्र होता है। राष्ट्रीय स्वाभिमान शुन्य समाज नष्ट हो जाता है। स्वाभिमान तब पनपता है जब स्व पर अभिमान हो जैसे स्वभाषा, स्वदेश इत्यादि। स्वभाषा से ही स्वदेशी एवं स्वदेश प्रेम की भावना जुड़ी होती हैं क्योंक भाषा ही चिंतन का माध्यम होती है। स्वभाषा पर तभी अभिमान हो सकता है जब वह भाषा विश्व में सम्मनित हो, केवल बोलने वाली भाषा सम्मान प्राप्त नही कर सकती केवल यही कारण है कि फ्रांसीसी एवं जर्मन भाषा को बोलने व समझने वालों की संख्या लगभग 2 प्रतिशत होने के बावजूद वे सम्मानित हैं और विश्व में चीनी भाषा के बाद हिन्दी बोलने व समझने वालों की संख्या होने के बावजूद भी हिन्दी भाषा सम्मानित नहीं है। राष्ट्र का स्वाभिमान जहां राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रभुसता के प्रतीक संविधान, स्वतन्त्र विदेश नीति तथा आर्थिक आत्म निर्भरता में देखा जाता है। वहीं राष्ट्रीय भाषा के विकास में भी प्रकट होता है। अपनी भाषा के बिना राष्ट्र गंूगा है। भारत जैसे राष्ट्र में जहां 179 भाषाएं, 544 बोलियां है और संविधान द्वारा स्वीकृत 21 भाषाएं भी है वहां पर एक विदेशी भाषा में अध्ययन- अध्यापन, सरकारी कामकाज, न्यायालय तथा संसद का काम होना अपमानजनक ही कहा जाएगा। स्वभाषाके बिना कैसा स्वाभिमान ? जिसे अपनी मातृभाषा, राष्ट्रभाषा में बोलने और व्यवहार करने में शर्म आती है, गर्व का अनुभव नहीं होता वह स्वाभिमानी कैसे हो सकता है? स्वाभिमानी राष्ट्र के लिए स्वभाषा को सम्मान देना उतना ही आवश्यक है जितना जीने के लिए सांस लेना।

आज विश्व का कोई ऐसा विकासित अथवा प्रगतिशाील राष्ट्र नहीं जिसकी अपनी भाषा न हो और जिसे शिक्षा का माध्यम न बनाया गया है। दुर्भाग्य से इस देश में अंग्रेजों के समय हमारी भाषाओं को नष्ट करने का षडयन्त्र रचा गया। लोर्ड मैकाले ने जब पूरे भारत का भ्रमण किया और देखा कि भारत में चारों ओर समृद्धि हैं, यहां के लोग खुशहाल हैं समाज का जीवन उच्च स्तर का है तथा अनेकता होते हुए भी यहां का समाज एक आत्मा में बंधा है तो उसने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे देश में लम्बे समय तक अंग्रेज शासन नहीं कर सकते। उसने अंग्रेज सरकार को ऐक प्रारूप बनाकर दिया और उस प्रारूप मे कहा कि अगर भारत में अंग्रेेजों को लंबे समय तक शासन करना है तो यहां की शिक्षा पद्धति को नष्ट करके ऐसी शिक्षा पद्धती लागू करनी होगी जिसे पढ़ने से यहां की अगली आने वाली पीढ़ियां खून से तो भारतीय हों मगर चिंतन के स्तर पर अंग्रेजों के हित को सोचने वाली हो। ऐसी पीढ़ी जो अपनी सभ्यता, संस्कृति, भाषा एवं जीवन पद्धति के प्रति हीनता की भावना रखे और पश्चिमी सभ्यता को महान बनाने का कार्य पूरे भारतवर्ष में करे। इस शिक्षा नीति का सबसे खतरनाक पहलू था सम्पूर्ण माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा का माध्यम, अंग्रेजी को बनाना। केवल आठवीं तक ही मातृभाषा या प्रादेशिक भाषाओं में शिक्षा दे सकती थी। मैकाले मानस पुत्रों ने स्वतंत्र भारत में भी उसके बिछाए जाल को मजबूत किया तथा अंगेजी माध्यम के स्कूलों का जाल बिछा दिया है।

यह मनोविज्ञानिक सत्य है कि मौलिक चिंतन स्वभाषा में ही प्राप्त करने से सम्भव हैं। मानव जिस भाषा में सपने देखता है उसी भाषा में मौलिक चिंतन भी संभव है। सपने स्वभाषा में ही देखे जाते हैं और भौतिक चिंतन की उपज यानि अविष्कार प्रथमतः एक सपना ही होता है । दैनिक जीवन में प्रयोग की जाने वाली भाषा और पढ़ने लिखने वाली भाषा अलग होने से अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं की लिपी वैज्ञानिक है और अग्रेजी अवैज्ञानिक।

स्वभाषा में शिक्षा और शोध का कार्य किया जाना क्यों आवश्यक है इसे विस्तार से समझना आवश्यक है। माता और मातृभूमि के पश्चात यदि किसी का स्थान है तो वह मातृभाषा ही है। बच्चा मातृभाषा को तब से सीखने लगता है जब से वह अपनी इन्द्रियों द्वारा बाहरी संसार को जानने लगता है। अनुकरण से मातृभाषा का शिक्षण प्रारम्भ होता है तथा निरन्तर पठन-पाठन और अभ्यास से पुष्ट होता है। मातृभाषा का ज्ञान केवल अक्षर ज्ञान पर आधारित नहीं होता वह तो मां की लोरी और दूध के साथ बच्चे को प्राप्त हो जाता है। मातृभाषा में शिक्षण इस लिए जरूरी है क्योंकि वह संस्कार और परिष्कार की भाषा भी रहती है। भाषा का संस्कृति से गहरा सम्बन्ध रहता हैं। यदि मातृभाषा में शिक्षण होगा तो भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता, शुचिता, संयम, परोपकार तथा त्याग-भावना सहज ही बालक को मिलेंगे। यदि अंग्रजी में शिक्षा प्रारम्भ होगी तो भौतिकवादी चिंतन से जुड़े खान-पान, पहरावे, विरोधी को मिटाने और अपने स्वार्थ को बचाने के भाव सहज ही मिलेंगे। हर भाषा एक निश्चित संस्कृति की उपज होती है, इसलिए जब हम कोई भाषा लिखते है और उसका साहित्य पढ़ते है तो निश्चित रूप से उसकी संस्कृति से भी जुड़ते है उसे आत्मसात करते हैं। यदि हम चाहते हैं कि बच्चे मेरा भारत महानका नारा ही न लगाएं, इसके अर्थ को भी समझे तो जरूरी है कि शिक्षा का माध्यम अपनी भाषाएं हो। अपनी संस्कृति को अपनाए बिना, उससे जुड़े बिना कोई स्वाभिमानी नहीं हो सकता। किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र की पहचान उसकी संस्कृति ही हुआ करती है। अंग्रेजों ने सीधे हमारी संस्कृति ही पर प्रहार न करके इसे नष्ट करने के लिए, नीचा दिखाने के लिए, हमारी भाषाओं को नष्ट करने का रास्ता चुना। 18वीं शताब्दी तक अंग्रेजों के आने से पहले सारी शिक्षा भारतीय भाषाओं में थी।

स्वभाषा में शिक्षा और शोध पर जोर देना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि बच्चे की प्रतिभा का विकास, मौलिक चिन्तन का विकास, अपनी भाषा में ही संभव है। वैज्ञानिक दृष्टि से सभी उन्नत राष्ट्र चाहे जापान हो या रूस, अमेरिका हो या जर्मर्नी इंग्लैंड अथवा फ्रांस, सभी मातृभाषा में शिक्षा देते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भी जब तक भारत में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा था तब हमारे देश ने मेघनाथ साहा, जगदीश चंद्र बसु एवं सी0वी0 रमन जैसे महान वैज्ञानिको को जन्म दिया है। मातृभाषा या स्वभाषा में जब बच्चा पढ़ना प्रारम्भ करता है तो वह घर-परिवार से असंख्य संकल्पनाएं सीख कर आता है उसे केवल वर्णमाला सीख कर उससे लिखना ही सीखना होता है। बच्चा रोटीशब्द जानता है, स्कूल में उसे रोटीवर्णमाला सीखकर लिखने का अभ्यास ही करना होता है। उसे समझाना नहीं पड़ता कि रोटी क्या है। यदि ब्रेडबोलेंगे तो उसे पहले वर्णमाला सिखाएंगे, फिर ब्रेड क्या है यह बताएंगे और फिर दोनों को जोड़कर बच्चा सीखेगा कि ब्रेड किसे कहते हैं। यदि ग्रामीण परिवेश के बच्चे के सामने डबल रोटीपड़ी होगी तो उसे समझ नहीं आएगा कि थाली में पड़ी तवे की रोटी यदि रोटी है तो फिर डबल रोटीया ब्रेड क्या है। कहने का भाव यह है कि विदेशी भाषा में वस्तु की संकल्पना और उसको व्यक्त करने वाला प्रतीक एक साथ सिखना पड़ता है, जिससे बच्चे के मस्तिष्क पर अतिरिक्त दबाब पड़ता है और वह रट्टेबाजी की ओर अग्रसर होता है।

जो शक्ति मौलिक चिन्तन में लगनी थी वह शब्द रटने में व्यय होती है जबकि मातृभाषा के अधिकांश शब्द बच्चा सामाजिक व्यवहार में सीख जाता है और शब्दों में छिपी संकल्पना से भी परिचित होता है, उसे केवल वर्णमाला ही सीखनी होती है। विदेशी भाषा के पक्षधर कहते हैं कि अंग्रेजी पढ़कर बच्चा विश्वभर में घूम सकता है, बाहर का ज्ञान अर्जित कर सकता है परन्तु हमारा मानना है कि जिसका मौलिक चिन्तन अवरूद्ध है वह बाहर के ज्ञान का भी सीमित लाभ ही उठा पाएगा। गांधी जी ने कहा था कि अंग्रेजी भले ही बाहरी विश्व को देखने की खिड़की हो परन्तु अपने घर में जाने के लिए तो दरवाजा अर्थात स्वभाषा का ही प्रयोग होना चाहिए। जब शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा को बनाते हैं और बच्चे को अपनी भाषा से अपरिचित रखते हैं तो उसकी हालत उस व्यक्ति की सी होती है जो कि अपने घर में खिड़की से घुसने के लिए विवश है। अब आप जानते हैं कि खिड़कियों से घर में घुसने वालों को क्या कहा जाता है।

वैज्ञानिक शोध को मुलतः दो भागांे में बांटा जा सकता है। मौलिक शोध एवं अनुप्रयुक्त शोध। मौलिक शोध प्राकृतिक नियमों पर आधारित होता है तथा अनुप्रयुक्त शोध देश विशेष की समाज व्यवस्था, जलवायु, पर्यावरण एवं संसाधनों पर आधारित होता है। मौलिक शोध सभी देशों के लिए सम्मान होता है तथा उससे नियमों या सिद्धांतों का पता लगता है जैसे गुरूत्वाकर्षण का नियम। इन नियमों का अनुप्रयोग करते ही धरती से जुड़ा शोध होता है जिससे देश विशेष के अनुकुल प्रद्योगिकी का विकास होता है। शोध चाहे मौलिक हो या अनुप्रयुक्त पहली आवश्यकता है मौलिक चिंतन। मौलिक चिंतन के बिना कोई भी व्यक्ति सफल वैज्ञानिक या अच्छा शोधकर्ता नहीं बन सकता। दूसरी आवश्यकता है शोध लेखन के लिए भाषा पर अधिकार। व्यक्ति कितना भी चिंतन कर ले यदि उसका भाषा पर अधिकार नहीं है तो वह व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त नहीं कर सकता। ऐसे में वह अपने शोध की जानकारी दूसरों को नहीं प्रदान कर सकता।

तीसरी महत्वपूर्ण आवश्यकता है कि देश की मूलभूत मान्यताओं एवं आवश्यकताओं को गहराई से समझा जाए तथा उसके परिवेश से परिचित हुआ जाए। भारत की लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या गांव में हैं अतः भारत से जुड़ने के लिए अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ना आवश्यक हैं। विज्ञान के क्षेत्र में भारत का स्वर्णकाल वह समय था जब हमारे देश मे स्वभाषा का प्रचार था और वही देशभर में पठन-पाठन और चिन्तन-मनन की प्रमुख भाषा थी। हमारी सारी मौलिक उपलब्धियां चाहे वह ज्योतिष में हो या बीज गणित में, शल्य-चिकित्सा में हो या आयुर्वेद में, रसायन शास्त्र में हो या भौतिक शास्त्र में उसी समय की है। दर्शन, साहित्य और आध्यात्म में ही नहीं कलाओं में भी चर्म उत्कर्ष उसी समय हुआ। मध्यकाल तक आते-आते भारतीय भाषाओं का भी ह्रास हुआ और भारतीय वैज्ञानिक चिन्तन का भी। आज भी हमारी वैज्ञानिक उन्नति मौलिक चिन्तन पर कम तथा पश्चिमी शोध पर अधिक टिकी है। हम परमाणु ऊर्जा युरेनियम के माध्यम से खोज रहे है। यूरेनियम पश्चिम में अधिक है। हमारे यहां थोरियम अधिक है, हमें परमाणु ऊर्जा अधिकाधिक थोरियम आधारित परमाणु भटियों में खोजनी चाहिए।

विज्ञान की शिक्षा और शोध का स्तर भारत में गिर रहा है, युवा विज्ञान से विमुख हो रहे है। यदि हिमाचल का ही उदाहरण लें तो 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले मात्र 20 प्रतिशत छात्र विज्ञान विषय पढ़ते हैं जबकि 10वीं तक सभी उसे अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ते हैं। दसवीं तक हिन्दी में विज्ञान पढ़ा जाता है, 11-12वीं में अधिकांश विद्यालयों में अध्यापक अंग्रेजी माध्यम से ही पढ़ाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप छात्र अंग्रेजी में निपुण न होने से विज्ञान की पढ़ाई छोड़ जाते हैं। हम अंग्रेजी के कारण मेधावी ग्रामीण छात्रों को विज्ञान से वंचित कर रहे हैं। यदि 11-12वीं में अनिवार्य रूप से हिन्दी माध्यम में विज्ञान की शिक्षा का प्रावधान हो तो लाखों ग्रामीण छात्र विज्ञान पढ़ेंगे।

विदेशी भाषा को महत्व देकर हमने अपने देश में विज्ञान को अंग्रेजी का गुलाम बना दिया। अंग्रेजी नहीं आती तो विज्ञान नहीं पढ़ा जा सकता। लाखों कारीगर, कुशल किसान अपने अनुभव महाविद्यालयों तक नहीं पहुंचा पाते क्योंिक वे अंग्रेजी नहीं जानते। सारा वैज्ञानिक शोध-कार्य अंग्रेजी में होने से भारतीय प्रतिभाओं का योगदान नहीं मिल पाता। शोध का जो व्यवहारिक या अनुप्रयुक्त रूप हैं, उसमें भी कमी आ रही है। हमारे किसान, कारीगर के लिए कौन सी तकनीक उपयुक्त है वह अंग्रेजी पढ़े शोधकर्ता नहीं समझ पाते क्योंकि वे किसान और कारीगर की भाषा और जरूरत को नही समझते केवल पश्चिम की नकल करते हैं।

भारतीय वैज्ञानिक जब अंग्रेजी माध्यम से पढ़कर आगे आते है तो भारतीय वैज्ञानिक विरासत जो संस्कृत अथवा अन्य भारतीय भाषाओं में ह,ै उससे पूरी तरह कट जाते हैं और उसे घटिया मानने लगते हैं । यदि भारतीय वैज्ञानिक चाहते हैं कि राष्ट्र के लिए उपयोगी खोजें करें तो उन्हंे यहां के सामान्य किसान-कारीगर से अपनापन स्थापित करना होगा। भारतीय भाषाओं में उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान को परख कर प्रामाणिक घोषित करना होगा और इसके आधार पर अपनी आगामी शोध परियोजनाएं बनानी होगी। आज के इस प्रतियोगात्मक युग में दो ही तरह के राष्ट्र रह जाएगें-एक वे जो ज्ञान का उत्पादन करते हैं दूसरे वे जो ज्ञान का उपभोग करते है। आज ज्ञान मुफ्त में नहीं मिलता, नई तकनीक, सूचना पाने के लिए रॉयल्टी सा पेटेन्ट अधिकार के रूप में कीमत चुकानी पड़ती है। इस प्रकार ज्ञान के उत्पादक राष्ट्र अमीर होते जाएंगे और उपभोक्ता राष्ट्र गरीब होते जाऐंगे। अमरीका में विश्व के 80 प्रतिशत नोबेल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिक पढ़ा रहे हैं क्योंकि वह ज्ञान-उत्पादक लोगों को खरीदकर उनसे ज्ञान पैदा करवाता है और फिर मनमाने दामों पर बेचता है।

वर्तमान समय भारत के लिए चुनौती भरा है जहां दुनिया भर के शक्तिशाली राष्ट्र भारत को एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देख रहे हैं वहीं दूसरी ओर भारत दुनिया का सबसे बड़ा युवा जनसंख्या वाला देश भी है। इस युवा पीढ़ी को राष्ट्र के निर्माण में लगाने के लिए उनके हृदयों में देश के प्रति स्वाभिमान व स्वदेश प्रेम की भावना भरने एवं अपनी सभ्यता एवं संस्कृति को गहराई से समझने हेतु स्वभाषा महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। भारत का स्वाभिमान, भारत की उन्नति इस बात पर निर्भर करेगी कि हम कब ज्ञान के उत्पादक राष्ट्रों में अग्रणी बनेंगे। इसके लिए मौलिक शोध की जरूरत है जो मौलिक चिंतन से आएगी और जिसका आधार स्वभाषा में अध्धयन अध्यापन ही बन सकता हैं।

भौतिकी विज्ञान विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला

एआईईईई : सीबीएसई बोर्ड की साख़ पर लगा बट्टा

लखनऊ। 1 May , 2011 शिक्षा क्षेत्र में हो रहे नैतिक पतन ने पूरी ब्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया। सीबीएसई बोर्ड द्वारा संचालित ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेंस एक्जाम (एआईईईई) के पेपर लीक होने से जहाँ एक तरफ इस बोर्ड की साख़ पर बट्टा लगा वहीं शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त खामिया एक बार फिर जनता के सामने उजागर हुयी हैं। इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा के पेपर लीक होने का तात्कालिक परिणाम भले ही यह नजर आ रहा हो कि इससे विद्यार्थियों को मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा और कुछ देर के लिए उलझन की स्थिति पैदा हुई, लेकिन इसके कारण कहीं ज्यादा गहरे और परिणाम दूरगामी हैं। महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर लीक होना अब आम बात होती जा रही है। आज फिर ये साबित हो गया कि पुरानी गलतियों से हमारे देश में कोई सबक नहीं लिया जाता। इंजीनियर बनने का ख्वाब देख रहे 15 लाख छात्रों के पैरों तले जमीन उस समय खिसक गयी जब उन्हें पता चला कि ऑल इंडिया इंजीनियरिंग एंट्रेंस एक्जाम का पर्चा लीक हो गया। नतीजा ये कि परीक्षा कराने वाली सीबीएसई को नए पेपर के साथ और नए वक्त पर परीक्षा करानी पड़ी।

इंजीनियरिंग का ये पेपर परीक्षा शुरू होने से 10 घंटे पहले ही आ गया था। इंजीनियरिंग का ये वो पेपर है जिसे परीक्षा के बाद भी सेंटर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता। यही पेपर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में 6 लाख रुपए में बिका। पेपर लीक होने की खबर देश में आग की तरह फैली। पेपर लीक मामले में बताया जा रहा है कि कानपुर से दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 15 लाख छात्रों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। हजारों छात्र ऐसे भी थे जो चिलचिलाती गर्मी में अपना शहर छोड़कर दूसरे शहर में परीक्षा देने के लिए पहुंचे थे।

लीक हुए इंजीनियरिंग के पेपर का फैक्स मिलने के बाद झटका सीबीएसई को भी लगा जिस पर परीक्षा कराने की जिम्मेदारी थी। ऐसे में चंद मिनटों बाद ही शुरू होने जा रही परीक्षा को रोकने का फैसला किया गया। आनन-फानन में पुणे, लखनऊ, दिल्ली, कानपुर, तमाम सेंटरों से ये खबर आने लगी कि इंजीनियरिंग की परीक्षा रोक दी गई है। जिन केंद्रों पर छात्रों में पेपर बांटा जा चुका था वहां उनसे पेपर छीन लिया गया। परीक्षा केंद्रों से छात्रों को बाहर धकेलने के बाद सीबीएसई ने फरमान सुना दिया कि परीक्षा रद्द नहीं होगी। तय ये किया गया कि परीक्षा के लिए तैयार किए गए तीन सेट में से दूसरा पेपर छात्रों में बांटा जाएगा। परीक्षा तय समय से 3 घंटे देरी से होगी। साढ़े 9 बजे होने वाली पहली पाली की परीक्षा दोपहर 12 बजे से कराई जाएगी। दूसरी पाली की परीक्षा शाम 4 बजे से होगी।

लेकिन ये फरमान सुनाते वक्त सीबीएसई के आला अफसर ये भूल गए कि एक मई को ही सेना के मेडिकल कॉलेजों के लिए भी भर्ती परीक्षा होनी तय है। एएफएमसी की इस परीक्षा का समय दोपहर के 2 बजे था। सीबीएसई ने ये ध्यान ही नहीं रखा कि जो छात्र इंजीनियरिंग का तीन घंटे तक चलने वाला पहला पेपर देंगे वो 2 बजे से एएफएमसी की परीक्षा कैसे दे पाएंगे। सीबीएसई ये भी भूल गई कि एक ही सेंटर पर एक ही वक्त में इंजीनियरिंग और मेडिकल की परीक्षा कैसे होगी। क्योंकि हजारों की तादाद में छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल दोनों ही परीक्षाओं में बैठते हैं।

पेपर लीक के चलते पहले से परेशान छात्रों पर इस फैसले ने दोहरी मार की। घंटों तक असमंजस की हालत बनी रही। छात्रों की परेशानी बढ़ती देख आखिरकार सेना के अफसर हरकत में आए। एएफएमसी ने छात्रों को राहत देते हुए ये फैसला किया कि वो दोपहर 2 बजे के बजाय 4 बजे से परीक्षा शुरू कराएंगे। इससे जो छात्र इंजीनियरिंग का सिर्फ पहला पेपर देकर मेडिकल का इम्तिहान देना चाहते थे। उनकी मुश्किल खत्म हो गई। मालूम हो कि इंजीनियरिंग का दूसरा पेपर देना उन्हीं छात्रों के लिए जरूरी होता है जो आर्टिटेक्चर की पढ़ाई करना चाहते हैं। वैसे सीबीएसई के रवैये को देखते हुए सेना के अफसर भी अपनी नाराजगी छिपा नहीं पाए।

गौरतलब है कि इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिए पहले 24 अप्रैल की तारीख तय की गई थी। लेकिन सीबीएसई ने बिना सोचे-समझे तारीख 1 मई कर दी जबकि इस दिन पहले से ही सेना के मेडिकल कॉलेजों के लिए परीक्षा होनी तय थी। पेपर लीक होने के बाद घंटों तक मचे बवाल की ये एक बड़ी वजह रही। छात्रों की परेशानी और हर तरफ से बढ़ते दबाव को देखते हुए सीबीएसई को आखिरकार एक और फैसला करना पड़ा।

सीबीएसई का फैसला किया कि जो छात्र एएफएमसी के चलते रविवार की परीक्षा नहीं दे पाए उनकी परीक्षा 8 मई को दोबारा ली जाएगी। इस खबर के बाद छात्रों के जान में जान आई। विदित हो कि एआईईईई का पेपर दो बक्सों के भीतर चार तालों में बंद होकर पहुंचता है। को-ऑर्डिनेटर के मुताबिक ऊपर के बक्से में लगे दो तालों की चाबियां नहीं होती। इन्हें तोड़ना पड़ता है। उसके भीतर रखे बक्से की चाबियां खोलकर पेपर बाहर निकाला जाता है। यह बक्सा बैंक में रखा रहता है और परीक्षा के कुछ समय पहले ही बाहर निकाला जाता है।

आज देश में चारों ओर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। जाहिर है कि शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। लेकिन एसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या इंजीनियरिंग जैसे अहम परीक्षाओं के पर्चा लीक होने को रोक पाना प्रशासन के बस की बात नहीं। यह इसलिए और भी ज्यादा चिंता का विषय है क्योंकि अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले विद्यार्थी कल देश के गंभीर और जिम्मेदार पदों पर होंगे और उनके कंधों पर महत्वपूर्ण दायित्व होंगे।

(अवनीश सिंह की रिपोर्ट)